Donderdag 10 September 2026

पहाड़ी क्षेत्रों के विकास, वर्षा आधारित कृषि और प्राकृतिक खेती को बढ़ावा देने की पहल; स्थानीय व पारंपरिक बीजों का जुटाया जा रहा विस्तृत आंकड़ा

भरोग बनेड़ी बनेगा बीज ग्राम, 151 किसानों तक पहुंचा प्रयास सोसाइटी का कृषि सर्वेक्षण

पहाड़ी क्षेत्रों के विकास, वर्षा आधारित कृषि और प्राकृतिक खेती को बढ़ावा देने की पहल; स्थानीय व पारंपरिक बीजों का जुटाया जा रहा विस्तृत आंकड़ा

सिरमौर, 09 सितंबर । भरोग बनेड़ी गांव को बीज ग्राम के रूप में विकसित करने की दिशा में प्रयास सोसाइटी द्वारा कृषि एवं पारंपरिक बीजों को लेकर आधारभूत सर्वेक्षण किया जा रहा है। पहाड़ी क्षेत्र विकास के लिए व्यावसायिक सहायता संस्था (पीएएचएडी ट्रस्ट) तथा हिमाचल पुनर्जीवित वर्षा आधारित कृषि नेटवर्क (हिमआरआरए) के सहयोग से चल रहे इस सर्वेक्षण के तहत अब तक 151 किसानों से संपर्क कर उनकी कृषि व्यवस्था, फसलों, स्थानीय किस्मों और पारंपरिक बीजों से संबंधित महत्वपूर्ण जानकारी जुटाई जा चुकी है।
सर्वेक्षण के प्रथम चरण में प्रयास सोसाइटी की टीम ने 101 किसानों से बातचीत कर उनकी कृषि व्यवस्था, फसलों, स्थानीय किस्मों और बीजों से संबंधित प्रारंभिक जानकारी एकत्रित की। इसके बाद दूसरे चरण में 50 किसानों से विस्तृत बातचीत कर निर्धारित सर्वेक्षण प्रपत्र भरने का कार्य किया गया। इस प्रकार दोनों चरणों में अब तक कुल 151 किसानों तक पहुंच बनाई जा चुकी है।
प्रयास सोसाइटी के सचिव धीरज रमौल ने बताया कि सर्वेक्षण का उद्देश्य केवल किसानों की संख्या दर्ज करना नहीं है, बल्कि भरोग बनेड़ी गांव में उपलब्ध स्थानीय एवं पारंपरिक बीजों, फसल विविधता तथा किसानों द्वारा वर्षों से अपनाई जा रही बीज संरक्षण की परंपरा को समझना और उसका व्यवस्थित दस्तावेजीकरण करना है।
उन्होंने बताया कि सर्वेक्षण के दौरान किसानों से उनकी भूमि का कुल क्षेत्रफल, सिंचित एवं वर्षा आधारित भूमि, बीज उत्पादन के लिए उपलब्ध भूमि तथा खेतों में उगाई जा रही विभिन्न फसलों और उनकी स्थानीय किस्मों के बारे में जानकारी ली जा रही है। इसके साथ ही प्रत्येक फसल का क्षेत्रफल, कितने वर्षों से उसकी खेती की जा रही है तथा किसानों के पास उपलब्ध बीज की अनुमानित मात्रा सहित विभिन्न कृषि संबंधी विवरण भी दर्ज किए जा रहे हैं।
सर्वेक्षण में यह भी जानकारी जुटाई जा रही है कि किसान अपने बीज स्वयं सुरक्षित रखते हैं अथवा बाजार से खरीदते हैं। साथ ही यह जानने का प्रयास किया जा रहा है कि कोई बीज कितने वर्षों से परिवार के पास सुरक्षित है और क्या कोई पारंपरिक बीज कई पीढ़ियों से परिवार में चला आ रहा है।
धीरज रमौल ने कहा कि स्थानीय बीजों की पहचान केवल उनकी उपलब्धता तक सीमित नहीं है। सर्वेक्षण के माध्यम से यह भी समझने का प्रयास किया जा रहा है कि विभिन्न पारंपरिक बीज सूखा, पाला, ओलावृष्टि, हिमपात और अत्यधिक वर्षा जैसी स्थानीय परिस्थितियों में किस प्रकार प्रदर्शन करते हैं। इससे भविष्य में किसानों के लिए अधिक उपयुक्त, टिकाऊ और स्थानीय परिस्थितियों के अनुकूल फसल किस्मों की पहचान करने में मदद मिलेगी।
उन्होंने कहा कि भरोग बनेड़ी जैसे पहाड़ी गांवों में किसानों के पास वर्षों से संरक्षित अनेक स्थानीय बीज और पारंपरिक कृषि ज्ञान मौजूद हैं। यदि इनका समय रहते दस्तावेजीकरण, संरक्षण और संवर्धन किया जाए तो यह क्षेत्र की कृषि जैव-विविधता को बचाने के साथ-साथ किसानों की आत्मनिर्भरता को भी मजबूत कर सकता है।

प्रशिक्षण और तकनीकी सहयोग की जरूरत भी समझी जा रही

सर्वेक्षण के दौरान किसानों की प्रशिक्षण, तकनीकी मार्गदर्शन, मिट्टी परीक्षण, बीज परीक्षण, बीज भंडारण, विपणन तथा सामुदायिक बीज बैंक से संबंधित आवश्यकताओं को भी समझा जा रहा है। इसके अलावा किसानों की बीज उत्पादन का रिकॉर्ड रखने, खेतों का समय-समय पर निरीक्षण कराने, बीज की गुणवत्ता बनाए रखने तथा पारंपरिक बीजों को लंबे समय तक सुरक्षित रखने की क्षमता और रुचि का भी आकलन किया जा रहा है।
पीएएचएडी ट्रस्ट और हिमआरआरए के सहयोग से आगे बढ़ रही पहल
प्रयास सोसाइटी के सचिव धीरज रमौल ने बताया कि इस महत्वपूर्ण कार्य में पीएएचएडी ट्रस्ट के निदेशक एवं हिमआरआरए के राज्य प्रभारी अनूप कुमार का मार्गदर्शन और सहयोग प्राप्त हो रहा है। वहीं पीएएचएडी ट्रस्ट की कृषि सलाहकार कर्मण्या जसरोतिया द्वारा कृषि संबंधी तकनीकी मार्गदर्शन प्रदान किया जा रहा है।
उन्होंने कहा कि पीएएचएडी ट्रस्ट और हिमआरआरए के सहयोग से पहाड़ी क्षेत्रों में वर्षा आधारित कृषि, प्राकृतिक खेती, स्थानीय कृषि संसाधनों के संरक्षण और किसानों की क्षमता बढ़ाने की दिशा में कार्य किया जा रहा है। इसी कड़ी में भरोग बनेड़ी में किया जा रहा सर्वेक्षण भविष्य की कृषि योजना तैयार करने में महत्वपूर्ण आधार साबित होगा।
इसके साथ ही कृषि प्रौद्योगिकी एवं विपणन एजेंसी (एटीएमए) के अंतर्गत राजीव गांधी प्राकृतिक खेती कौशल किसान योजना से जुड़े प्रयासों के माध्यम से भी प्राकृतिक एवं टिकाऊ कृषि को बढ़ावा देने की दिशा में कार्य किया जा रहा है।

151 किसानों तक पहुंचना महत्वपूर्ण उपलब्धि

धीरज रमौल ने कहा कि अब तक 151 किसानों तक पहुंच बनाना सर्वेक्षण की महत्वपूर्ण शुरुआत है। सर्वेक्षण से प्राप्त आंकड़ों के आधार पर भरोग बनेड़ी में उपलब्ध स्थानीय फसलों, पारंपरिक बीजों और कृषि पद्धतियों की वास्तविक स्थिति का आकलन किया जाएगा। इसके बाद किसानों की आवश्यकता के अनुसार प्रशिक्षण, तकनीकी सहयोग, बीज संरक्षण और अन्य गतिविधियों के लिए आगे की कार्ययोजना तैयार की जाएगी।
उन्होंने कहा कि प्रयास सोसाइटी का उद्देश्य किसानों की पारंपरिक बीज संपदा को पहचान, संरक्षण और उचित मंच प्रदान करना है। संस्था का प्रयास है कि गांव में “किसान का बीज, किसान के खेत और किसान के हाथ में बीज की पहचान” को मजबूत किया जाए।
उन्होंने कहा कि स्थानीय बीजों का संरक्षण केवल कृषि तक सीमित विषय नहीं है, बल्कि यह कृषि जैव-विविधता, खाद्य सुरक्षा, पारंपरिक ज्ञान और आने वाली पीढ़ियों के भविष्य से भी जुड़ा हुआ है। यदि स्थानीय स्तर पर उपलब्ध पारंपरिक बीजों का समय रहते संरक्षण, संवर्धन और दस्तावेजीकरण किया जाता है तो भरोग बनेड़ी को एक आदर्श बीज ग्राम के रूप में विकसित करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम उठाया जा सकता है।



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