Vrydag 31 Julie 2026

Partner with PARAYAS Society to Create Sustainable Social Impact

Partner with PARAYAS Society to Create Sustainable Social Impact

PARAYAS Society is a grassroots non-profit organization working since 2002 to improve the lives of rural communities in Himachal Pradesh through sustainable development initiatives.

Our key areas of work include:

  • Water Conservation and Rainwater Harvesting
  • Revival of Natural Springs
  • Environmental Protection and Tree Plantation
  • Disaster Risk Reduction and Community Resilience
  • Youth Development and Skill Building
  • Health, Education, and Community Awareness
  • Rural Livelihood and Community Participation

We believe that meaningful change is possible when communities, corporate organizations, and development partners work together.

We are seeking CSR partnerships, grants, institutional collaborations, and philanthropic support to implement sustainable projects that create measurable and long-term impact in rural areas.

If your organization is looking for a reliable grassroots implementation partner in Himachal Pradesh, we would be pleased to explore opportunities for collaboration.

Together, we can create stronger communities, protect the environment, and build a sustainable future.

Contact

Dheeraj Ramoul
Secretary, PARAYAS Society
Email: societyparayas1@gmail.com
Mobile: +91 8219852185

Together for Sustainable Development. Together for Positive Change.

Protecting the Environment – Our Shared Responsibility Nature provides us with clean air, fresh water, food, and the resources essential for life. Protecting the environment is not just a choice—it is our collective responsibility. The future of coming generations depends on the actions we take today.PARAYAS Society is committed to promoting environmental conservation through tree plantation, water conservation, restoration of natural springs, biodiversity protection, and community awareness. We believe that sustainable development can only be achieved when people and nature grow together.Every tree planted, every drop of water saved, and every positive action taken for nature contributes to a healthier planet and a better future.Let us join hands to protect our environment, conserve natural resources, and build a greener, cleaner, and more sustainable world."Protect Nature Today, Secure Tomorrow." Dheeraj Ramoul Secretary, PARAYAS Society

Tree Plantation Is Not Just an Event - It Is Our Responsibility Towards the Future PARAYAS Society believes that environmental protection is not only the responsibility of the government but also a shared duty of every citizen. With this vision, the Society regularly organizes tree plantation drives involving local communities, youth, students, and volunteers.A tree is much more than greenery. It provides clean air, helps conserve water, supports biodiversity, and creates a healthier environment for future generations. Our commitment does not end with planting trees; we place equal importance on their protection, care, and long-term survival.Let us all pledge to make "One Person - One Tree" a people's movement and fulfill our responsibility towards nature.PARAYAS Society"Protect Nature - Secure Humanity."

बरसात की हर बूंद बने भविष्य की पूंजी, प्राकृतिक जल स्रोतों को बचाने के लिए जनभागीदारी जरूरी: धीरज रमौल सिरमौर। हिमाचल प्रदेश में मानसून की बारिश जहां एक ओर लोगों को गर्मी से राहत देती है, वहीं दूसरी ओर यह प्राकृतिक जल स्रोतों को पुनर्जीवित करने का सबसे महत्वपूर्ण अवसर भी लेकर आती है। यदि इस वर्षा जल का वैज्ञानिक और योजनाबद्ध तरीके से संरक्षण किया जाए तो भविष्य में पेयजल संकट, भूजल स्तर में गिरावट तथा सूखते प्राकृतिक चश्मों की समस्या को काफी हद तक कम किया जा सकता है। यह बात प्रयास सोसाइटी के सचिव धीरज रमौल ने वर्षा जल संरक्षण पर जारी एक प्रेस वक्तव्य में कही।धीरज रमौल ने कहा कि हिमाचल प्रदेश की पहचान उसकी प्राकृतिक संपदा, घने जंगलों, पहाड़ी जलधाराओं, बावड़ियों, नौलों, कुओं और प्राकृतिक चश्मों से रही है। लेकिन पिछले कुछ वर्षों में जलवायु परिवर्तन, अनियोजित विकास, वनों की कटाई, कंक्रीट का बढ़ता दायरा तथा वर्षा जल के संरक्षण की उपेक्षा के कारण अनेक प्राकृतिक जल स्रोत धीरे-धीरे समाप्त होते जा रहे हैं। कई गांवों में लोग आज भी गर्मियों के दौरान पेयजल संकट का सामना करते हैं, जबकि बरसात के दिनों में करोड़ों लीटर पानी बिना उपयोग के बहकर नदियों में चला जाता है।उन्होंने कहा कि यदि आज वर्षा जल को धरती में समाने का अवसर दिया जाए तो यही पानी आने वाले महीनों में प्राकृतिक चश्मों, कुओं और भूजल को जीवन देगा। इसलिए यह समय केवल बारिश का आनंद लेने का नहीं, बल्कि जल संरक्षण को जनआंदोलन बनाने का है।धीरज रमौल ने प्रदेश सरकार, पंचायत प्रतिनिधियों, वन विभाग, जल शक्ति विभाग तथा ग्रामीण समुदायों से अपील की कि प्रत्येक पंचायत अपने क्षेत्र के प्राकृतिक जल स्रोतों का सर्वेक्षण कर उनकी सफाई, संरक्षण और पुनर्जीवन की कार्ययोजना तैयार करे। जहां-जहां प्राकृतिक चश्मे सूख चुके हैं, वहां वर्षा जल को रिचार्ज करने के लिए छोटे-छोटे जल संचयन ढांचे विकसित किए जाएं। इससे आने वाले वर्षों में जल उपलब्धता बढ़ेगी और ग्रामीण क्षेत्रों में पेयजल संकट कम होगा।उन्होंने कहा कि जिन लोगों ने अपने घरों, संस्थानों या खेतों में बोरवेल लगाए हैं, वे वर्षा जल रिचार्ज प्रणाली अपनाएं। इससे भूजल स्तर सुधरेगा और भविष्य में पानी की उपलब्धता बनी रहेगी। साथ ही खेतों में मेड़बंदी, छोटे तालाब, सोख्ता गड्ढे तथा पारंपरिक जल संरक्षण तकनीकों को बढ़ावा दिया जाना चाहिए।धीरज रमौल ने कहा कि जल संरक्षण केवल सरकार की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि प्रत्येक नागरिक का नैतिक दायित्व है। यदि हर परिवार वर्षा जल संरक्षण का एक छोटा कदम भी उठाए तो उसका सकारात्मक प्रभाव पूरे समाज पर पड़ेगा। उन्होंने युवाओं, स्वयं सहायता समूहों, महिला मंडलों, विद्यालयों और महाविद्यालयों से आग्रह किया कि वे अपने-अपने क्षेत्रों में जल संरक्षण अभियान चलाएं और लोगों को प्राकृतिक जल स्रोतों के महत्व के बारे में जागरूक करें।उन्होंने सुझाव दिया कि ग्राम सभाओं में जल संरक्षण को स्थायी एजेंडा बनाया जाए और प्रत्येक वर्ष मानसून के दौरान प्राकृतिक चश्मों, बावड़ियों और जलधाराओं की सामुदायिक सफाई का अभियान चलाया जाए। इससे न केवल जल स्रोत सुरक्षित होंगे बल्कि लोगों में पर्यावरण संरक्षण के प्रति सामूहिक जिम्मेदारी की भावना भी विकसित होगी।प्रयास सोसाइटी ने घोषणा की कि संस्था आने वाले समय में विभिन्न गांवों में प्राकृतिक जल स्रोतों की स्थिति का अध्ययन, जन-जागरूकता कार्यक्रम तथा वर्षा जल संरक्षण को बढ़ावा देने के लिए स्थानीय समुदायों के साथ मिलकर अभियान चलाएगी। संस्था का उद्देश्य लोगों को यह समझाना है कि जल संरक्षण केवल आज की आवश्यकता नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के सुरक्षित भविष्य की सबसे बड़ी जिम्मेदारी है।अंत में धीरज रमौल ने प्रदेशवासियों से भावनात्मक अपील करते हुए कहा, "यदि हम इस बरसात में वर्षा की हर बूंद को बचाने का संकल्प लें, तो आने वाली पीढ़ियों को पानी के लिए संघर्ष नहीं करना पड़ेगा। प्रकृति हमें हर वर्ष जीवन का यह अनमोल उपहार देती है। आइए, हम सभी मिलकर हिमाचल के प्राकृतिक जल स्रोतों को पुनर्जीवित करें, वर्षा जल को धरती में उतारें और जल संरक्षण को जन-जन का अभियान बनाएं। यही सच्ची पर्यावरण सेवा और भविष्य के प्रति हमारी सबसे बड़ी जिम्मेदारी होगी।"

Woensdag 29 Julie 2026



Vision
To achieved the goals of voluntary aspects through integrated development of rural community.
Mission
To achieve the vision is to make the base line survey of the operational area and implement the relevant application to meet the overall requirement of the community.

Dinsdag 28 Julie 2026

प्राकृतिक खेती एवं लघु अनाजों को बढ़ावा देना समय की आवश्यकता : धीरज रमौल सिरमौर । प्रयास सोसाइटी द्वारा हिम आरआरए नेटवर्क के सहयोग से जिला सिरमौर की ग्राम पंचायत भरोग बनेड़ी के ग्राम भरोग बनेड़ी में प्राकृतिक खेती, देशी बीजों के संरक्षण तथा लघु अनाजों (मिलेट्स) को बढ़ावा देने के उद्देश्य से व्यापक डोर-टू-डोर कृषि सर्वेक्षण एवं जनजागरूकता अभियान चलाया गया। इस अभियान के दौरान सोसाइटी के कार्यकर्ताओं ने घर-घर जाकर किसानों से संवाद स्थापित किया तथा प्राकृतिक खेती, आत्मनिर्भर कृषि व्यवस्था और पारंपरिक बीज संरक्षण के महत्व पर विस्तार से चर्चा की।सर्वेक्षण के दौरान किसानों से खरीफ, रबी एवं जायद मौसम में उगाई जाने वाली फसलों, प्राकृतिक खेती अपनाने की स्थिति, उपलब्ध कृषि भूमि, देशी बीजों की उपलब्धता, सिंचाई के स्रोत तथा स्थानीय बीज संरक्षण की परंपराओं से संबंधित जानकारी एकत्रित की गई। सर्वेक्षण में यह पाया गया कि क्षेत्र के किसान आज भी अनेक पारंपरिक एवं स्थानीय फसलों का संरक्षण कर रहे हैं तथा स्वयं तैयार किए गए बीजों का उपयोग करते हैं। साथ ही अधिकांश किसान प्राकृतिक खेती की ओर बढ़ रहे हैं और पारंपरिक कृषि ज्ञान को संरक्षित करने में रुचि दिखा रहे हैं।सर्वेक्षण में किसानों द्वारा उगाई जाने वाली प्रमुख खरीफ फसलों में मक्का, धान, सोयाबीन, उड़द, मूंग, लोबिया, तिल, अदरक, हल्दी, अरबी, खीरा, लौकी, तुरई, कद्दू, टमाटर, मिर्च, बैंगन, भिंडी तथा चलाई शामिल हैं। वहीं रबी फसलों में गेहूँ, जौ, राजमा, मसूर, चना, काला चना, सरसों, राई, धनिया, मेथी, लहसुन, प्याज, मटर तथा कुल्थी जैसी फसलें प्रमुख रूप से उगाई जाती हैं। इसके अतिरिक्त कई किसानों द्वारा कश्मीरी लहसुन, बड़ी इलायची, कलजीरी, अलसी, मंडुवा (रागी), भट्ट, फरासबीन तथा अन्य स्थानीय किस्मों का भी संरक्षण किया जा रहा है।सर्वेक्षण में यह भी सामने आया कि अधिकांश किसान स्वयं संरक्षित बीज (Own Saved Seed), स्थानीय किसानों के बीच बीज आदान-प्रदान (Local Farmer Exchange) तथा सामुदायिक बीज साझाकरण प्रणाली (Community Seed Sharing System) के माध्यम से देशी बीजों का संरक्षण कर रहे हैं। यह परंपरा क्षेत्र की कृषि जैव विविधता को सुरक्षित रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है और भविष्य में सीड विलेज (Seed Village) की अवधारणा को मजबूत करने में भी सहायक होगी।प्रयास सोसाइटी के सचिव धीरज रमौल ने कहा कि प्राकृतिक खेती, देशी बीजों का संरक्षण और लघु अनाजों को बढ़ावा देना वर्तमान समय की सबसे बड़ी आवश्यकता है। उन्होंने कहा कि रासायनिक खेती पर बढ़ती निर्भरता के कारण भूमि की उर्वरता प्रभावित हो रही है, जबकि प्राकृतिक खेती कम लागत, बेहतर मिट्टी स्वास्थ्य और सुरक्षित खाद्य उत्पादन का प्रभावी विकल्प है।उन्होंने कहा कि मिलेट्स (लघु अनाज) जैसे मंडुवा, जौ, कुल्थी, भट्ट तथा अन्य पारंपरिक फसलें न केवल पोषण सुरक्षा प्रदान करती हैं, बल्कि जलवायु परिवर्तन की चुनौतियों का सामना करने में भी सक्षम हैं। ऐसे अनाज कम पानी में बेहतर उत्पादन देते हैं तथा पर्वतीय क्षेत्रों के लिए अत्यंत उपयुक्त हैं।धीरज रमौल ने किसानों से अधिक से अधिक देशी एवं स्थानीय बीजों का उपयोग करने, अपने स्तर पर गुणवत्तापूर्ण बीज तैयार करने तथा बीज संरक्षण की पारंपरिक व्यवस्था को आगे बढ़ाने का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि यदि किसान स्वयं बीज तैयार करेंगे तो खेती की लागत कम होगी, बाहरी बीजों पर निर्भरता घटेगी और स्थानीय कृषि जैव विविधता सुरक्षित रहेगी।उन्होंने बताया कि प्रयास सोसाइटी द्वारा किए गए इस सर्वेक्षण के आधार पर हिम आरआरए नेटवर्क (HIM RRA Network) के सहयोग से प्राकृतिक खेती, सीड विलेज विकास, स्थानीय बीज बैंक की स्थापना, किसानों के क्षमता विकास, जल संरक्षण तथा जलवायु अनुकूल कृषि को बढ़ावा देने की दिशा में आगामी समय में भी संयुक्त रूप से कार्य किया जाएगा। इसके लिए विभिन्न प्रशिक्षण कार्यक्रम, किसान संवाद, बीज संरक्षण अभियान तथा जागरूकता गतिविधियाँ आयोजित की जाएंगी, ताकि ग्रामीण समुदाय आत्मनिर्भर एवं टिकाऊ कृषि प्रणाली को अपनाने के लिए प्रेरित हो सके।अभियान के अंत में किसानों एवं ग्रामीणों ने प्राकृतिक खेती अपनाने, देशी बीजों के संरक्षण, लघु अनाजों के उत्पादन में वृद्धि तथा आत्मनिर्भर कृषि व्यवस्था को मजबूत बनाने के लिए सामूहिक रूप से कार्य करने का संकल्प लिया। प्रयास सोसाइटी एवं हिम आरआरए नेटवर्क ने कहा कि भविष्य में भी इस प्रकार के सर्वेक्षण, प्रशिक्षण एवं जनजागरूकता कार्यक्रम लगातार आयोजित किए जाएंगे, ताकि सिरमौर जिले के ग्रामीण क्षेत्रों में टिकाऊ, पर्यावरण अनुकूल तथा जलवायु-सहिष्णु कृषि को बढ़ावा मिल सके।

Maandag 27 Julie 2026

विद्यार्थियों को नशे से दूर रहने का दिया संदेश, स्वस्थ जीवन अपनाने का किया आह्वान सिरसा । राजकीय वरिष्ठ माध्यमिक विद्यालय, कीर्ति नगर, सिरसा में आयोजित नशा जागरूकता कार्यक्रम में प्रयास सोसाइटी के स्वयंसेवक रणजीत सिंह ने विद्यार्थियों को नशे के दुष्प्रभावों के बारे में जागरूक करते हुए उन्हें स्वस्थ, अनुशासित एवं समाजसेवा से जुड़े जीवन को अपनाने के लिए प्रेरित किया।इस अवसर पर रणजीत सिंह ने कहा कि आज नशा युवाओं के भविष्य के लिए सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक बनता जा रहा है। यदि समय रहते युवा वर्ग इस बुराई से नहीं बचा तो इसका दुष्प्रभाव केवल व्यक्ति तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि परिवार, समाज और राष्ट्र के विकास पर भी पड़ेगा। उन्होंने विद्यार्थियों से खेल, शिक्षा, योग, सांस्कृतिक गतिविधियों एवं सामाजिक सेवा में सक्रिय भागीदारी करने का आह्वान किया।उन्होंने विद्यार्थियों को "Say No to Drug, Say Yes to Life", "Say No to Drug, Say Yes to Games" तथा "Say No to Drug, Say Yes to Social Services" का संदेश देते हुए नशा मुक्त सिरसा, नशा मुक्त हरियाणा एवं नशा मुक्त भारत के निर्माण में अपनी सक्रिय भागीदारी निभाने की अपील की।रणजीत सिंह ने बताया कि नशे की लत मानसिक तनाव, अवसाद, याददाश्त में कमी, शारीरिक कमजोरी, हृदय, मस्तिष्क एवं यकृत को नुकसान, आर्थिक संकट, पारिवारिक कलह तथा सामाजिक प्रतिष्ठा में गिरावट जैसी गंभीर समस्याओं को जन्म देती है। इसलिए प्रत्येक विद्यार्थी को स्वयं नशे से दूर रहना चाहिए तथा अपने मित्रों और परिवार के लोगों को भी इसके प्रति जागरूक करना चाहिए।कार्यक्रम के अंत में विद्यार्थियों ने नशे से दूर रहने तथा समाज में नशा मुक्ति का संदेश फैलाने का संकल्प लिया। प्रयास सोसाइटी की ओर से कहा गया कि संस्था भविष्य में भी युवाओं के बीच ऐसे जनजागरूकता अभियान चलाती रहेगी, ताकि स्वस्थ, जागरूक एवं नशामुक्त समाज का निर्माण किया जा सके।

विद्यार्थियों को नशे से दूर रहने का दिया संदेश, स्वस्थ जीवन अपनाने का किया आह्वान

Sondag 26 Julie 2026

बरसात का मौसम जल स्रोतों को पुनर्जीवित करने का सुनहरा अवसर: धीरज रमौल

बरसात का मौसम जल स्रोतों को पुनर्जीवित करने का सुनहरा अवसर: धीरज रमौलसिरमौर। प्रयास सोसाइटी के सचिव धीरज रमौल ने प्रदेशवासियों से अपील करते हुए कहा है कि वर्तमान बरसात का मौसम सूख चुके प्राकृतिक जल स्रोतों (चश्मों) को पुनर्जीवित करने का सबसे उपयुक्त समय है। यदि आज सामूहिक प्रयास किए जाएं तो आने वाले वर्षों में पानी की कमी को काफी हद तक कम किया जा सकता है।उन्होंने कहा कि जिन क्षेत्रों में प्राकृतिक चश्मे और नौले सूख चुके हैं, वहां स्थानीय लोग, ग्राम पंचायतें, युवा मंडल, महिला मंडल और सामाजिक संगठन मिलकर वर्षा जल को उन जल स्रोतों तक पहुंचाने के लिए छोटे-छोटे रिचार्ज गड्ढे, कंटूर ट्रेंच, सोख्ता गड्ढे और जल संरक्षण के अन्य उपाय अपनाएं। इससे वर्षा का पानी जमीन में समाकर भूजल स्तर बढ़ाएगा और सूखे जल स्रोतों के दोबारा जीवित होने की संभावना बढ़ेगी।धीरज रमौल ने विशेष रूप से उन लोगों से भी आग्रह किया जिन्होंने अपने खेतों या घरों में बोरवेल लगाए हैं कि वे अपने बोरवेल का भी वर्षा जल से रिचार्ज करने की व्यवस्था करें। यदि प्रत्येक बोरवेल के साथ रिचार्ज पिट बनाया जाए तो भूजल स्तर में सुधार होगा और भविष्य में पानी की उपलब्धता बनी रहेगी।उन्होंने कहा कि केवल नए बोरवेल खोदना समस्या का समाधान नहीं है। यदि हम भूजल निकालते हैं तो उसे वापस धरती में पहुंचाने की जिम्मेदारी भी हमारी है। जल संरक्षण को जन आंदोलन बनाना होगा, तभी आने वाली पीढ़ियों को पर्याप्त और स्वच्छ पानी मिल सकेगा।प्रयास सोसाइटी ने सभी ग्राम पंचायतों, सरकारी विभागों, स्वयंसेवी संस्थाओं तथा आम नागरिकों से अपील की है कि इस बरसात में "हर बूंद को धरती में पहुंचाने" का संकल्प लें और अपने गांव के सूख चुके प्राकृतिक जल स्रोतों तथा बोरवेलों को रिचार्ज करने के लिए सामूहिक अभियान चलाएं।

Saterdag 25 Julie 2026

हिमाचल के पहाड़ी क्षेत्रों में उद्योगों की कमी विकास के लिए बड़ी चुनौती: धीरज रमौलसिरमौर। प्रयास सोसाइटी के सचिव धीरज रमौल ने कहा कि हिमाचल प्रदेश के अधिकांश पहाड़ी क्षेत्रों में आज भी बड़े और मध्यम उद्योगों का अभाव है, जिसके कारण स्थानीय युवाओं को रोजगार के लिए प्रदेश से बाहर पलायन करना पड़ रहा है। यदि संतुलित और पर्यावरण-अनुकूल औद्योगिक विकास पर समय रहते ध्यान नहीं दिया गया तो पहाड़ों से लगातार हो रहा पलायन भविष्य में और गंभीर समस्या बन सकता है।धीरज रमौल ने कहा कि हिमाचल की पहचान प्राकृतिक सौंदर्य, पर्यटन, बागवानी, कृषि और सांस्कृतिक विरासत से है, लेकिन केवल इन्हीं क्षेत्रों पर निर्भर रहकर प्रदेश के सभी युवाओं को स्थायी रोजगार उपलब्ध कराना संभव नहीं है। आवश्यकता इस बात की है कि स्थानीय संसाधनों, पारंपरिक उत्पादों और आधुनिक तकनीक को जोड़कर छोटे एवं मध्यम स्तर के उद्योगों को बढ़ावा दिया जाए।उन्होंने कहा कि सेब, कीवी, मशरूम, औषधीय एवं सुगंधित पौधे, शहद, मोटे अनाज, हस्तशिल्प, ऊनी वस्त्र, बांस तथा वन आधारित उत्पादों के प्रसंस्करण (Processing) के लिए पहाड़ी क्षेत्रों में उद्योग स्थापित किए जा सकते हैं। इससे स्थानीय किसानों और स्वयं सहायता समूहों की आय बढ़ेगी तथा युवाओं को अपने ही क्षेत्र में रोजगार मिलेगा।रमौल ने कहा कि उद्योगों की स्थापना के लिए केवल योजनाएं बनाना पर्याप्त नहीं है, बल्कि सड़क, बिजली, इंटरनेट, परिवहन, भंडारण, कौशल विकास और आसान ऋण जैसी बुनियादी सुविधाओं को भी मजबूत करना होगा। साथ ही पर्यावरण संरक्षण को सर्वोच्च प्राथमिकता देते हुए ऐसे उद्योगों को बढ़ावा दिया जाए जिनसे जंगलों, जल स्रोतों और जैव विविधता पर न्यूनतम प्रभाव पड़े।उन्होंने राज्य सरकार से आग्रह किया कि पहाड़ी क्षेत्रों के लिए विशेष औद्योगिक नीति तैयार की जाए, जिसमें स्थानीय उद्यमियों, महिला स्वयं सहायता समूहों, युवाओं और सामाजिक संस्थाओं को प्रोत्साहन दिया जाए। साथ ही जिला स्तर पर "वन डिस्ट्रिक्ट-वन प्रोडक्ट" जैसी योजनाओं को प्रभावी ढंग से लागू कर स्थानीय उत्पादों को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय बाजार तक पहुंचाने की व्यवस्था की जाए।धीरज रमौल ने कहा कि हिमाचल का विकास तभी संभव है जब पर्यटन, कृषि, बागवानी और पर्यावरण संरक्षण के साथ-साथ स्थानीय परिस्थितियों के अनुरूप उद्योगों का भी संतुलित विकास किया जाए। इससे पलायन रुकेगा, युवाओं को रोजगार मिलेगा, ग्रामीण अर्थव्यवस्था मजबूत होगी और प्रदेश आत्मनिर्भर बनने की दिशा में आगे बढ़ेगा।

Vrydag 24 Julie 2026

प्रकृति के साथ खिलवाड़ मानवता के भविष्य के लिए गंभीर खतरा: धीरज रमौलसिरमौर। प्रयास सोसाइटी के सचिव धीरज रमौल ने कहा है कि अंधाधुंध विकास, व्यक्तिगत स्वार्थ और प्राकृतिक संसाधनों के अनियंत्रित दोहन के कारण पर्यावरण का संतुलन लगातार बिगड़ रहा है। इसका परिणाम आज ग्लोबल वार्मिंग, जलवायु परिवर्तन, भीषण गर्मी, अनियमित वर्षा, बाढ़, सूखा, भूस्खलन तथा अन्य प्राकृतिक आपदाओं के रूप में सामने आ रहा है। यदि समय रहते प्रभावी कदम नहीं उठाए गए तो आने वाली पीढ़ियों को इसके गंभीर दुष्परिणाम भुगतने पड़ेंगे।धीरज रमौल ने कहा कि विकास आवश्यक है, लेकिन वह प्रकृति के संरक्षण के साथ संतुलित होना चाहिए। उन्होंने कहा कि सड़कों, भवनों और औद्योगिक परियोजनाओं के नाम पर बड़े पैमाने पर वनों की कटाई की जा रही है, जिससे वन्यजीवों का प्राकृतिक आवास समाप्त हो रहा है और वातावरण में कार्बन डाइऑक्साइड की मात्रा लगातार बढ़ रही है। वहीं, उद्योगों और वाहनों से निकलने वाला प्रदूषण हवा, पानी और मिट्टी को प्रदूषित कर मानव स्वास्थ्य के लिए गंभीर खतरा बनता जा रहा है।उन्होंने कहा कि भूजल का अत्यधिक दोहन, प्राकृतिक जलस्रोतों की उपेक्षा, अवैज्ञानिक खनन तथा संसाधनों का अंधाधुंध उपयोग भविष्य में जल संकट और पर्यावरणीय असंतुलन को और अधिक गंभीर बना सकता है। जलवायु परिवर्तन के कारण बढ़ती गर्मी, जंगलों में आग, ग्लेशियरों का तेजी से पिघलना और मौसम के बदलते स्वरूप स्पष्ट संकेत हैं कि प्रकृति लगातार चेतावनी दे रही है।प्रयास सोसाइटी के सचिव ने कहा कि पर्यावरण संरक्षण केवल सरकार की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि प्रत्येक नागरिक का नैतिक दायित्व भी है। उन्होंने लोगों से अधिक से अधिक वृक्षारोपण करने, प्लास्टिक के उपयोग को कम करने, जल एवं ऊर्जा संरक्षण अपनाने तथा पर्यावरण संरक्षण अभियानों से जुड़ने की अपील की।धीरज रमौल ने सरकार से भी मांग की कि अवैध वनों की कटाई, अनियंत्रित खनन और प्राकृतिक संसाधनों के दोहन पर सख्ती से रोक लगाई जाए। प्रत्येक विकास परियोजना में पर्यावरणीय मानकों का कठोरता से पालन सुनिश्चित किया जाए तथा प्राकृतिक जलस्रोतों और जैव विविधता के संरक्षण के लिए प्रभावी एवं दीर्घकालिक नीतियां लागू की जाएं।उन्होंने कहा कि यदि आज प्रकृति की रक्षा के लिए सामूहिक प्रयास नहीं किए गए तो आने वाले समय में पर्यावरणीय संकट और भी विकराल रूप ले सकता है। उन्होंने सभी नागरिकों से प्रकृति संरक्षण को जनआंदोलन बनाने का आह्वान करते हुए कहा कि "प्रकृति बचेगी तभी मानवता का भविष्य सुरक्षित रहेगा।"

Sondag 19 Julie 2026

प्रयास सोसाइटी के अंतरराष्ट्रीय समाजसेवी रंजीत सिंह टक्कर ने राष्ट्रीय एकता, युवा नेतृत्व एवं समाज सेवा का दिया संदेश

बढ़ता तापमान और जलवायु परिवर्तन मानव स्वास्थ्य के लिए गंभीर चुनौती - गुणवत्तापूर्ण नींद बचाने के लिए पर्यावरण संरक्षण आवश्यक : धीरज रमौल

Climate Change and Sleep Health Report 2026 is an awareness publication by PARAYAS Society (Participatory Action for Rural Advancement and Youth Awareness), Himachal Pradesh, India. The report explains how climate change, rising temperatures, heatwaves, and warmer nights affect human sleep, health, productivity, and overall well-being. It also highlights practical measures for climate action, environmental conservation, water conservation, tree plantation, renewable energy, and sustainable lifestyles. This publication is intended for students, researchers, educators, policymakers, NGOs, and the general public.

Saterdag 18 Julie 2026

आज दुनिया भर में बढ़ती गर्मी, हीटवेव और मौसम के बदलते स्वरूप का एक बड़ा कारण जलवायु परिवर्तन (Climate Change) माना जा रहा है। वैज्ञानिकों के अनुसार, मानव गतिविधियों से बढ़ने वाली ग्रीनहाउस गैसों के कारण पृथ्वी का औसत तापमान लगातार बढ़ रहा है, जिससे हीटवेव अधिक बार, अधिक तीव्र और अधिक समय तक रहने लगी हैं।इस बढ़ती गर्मी का सबसे बड़ा असर लोगों की नींद पर भी पड़ रहा है। दुनिया भर में बहुत से लोग उतनी अच्छी और पर्याप्त नींद नहीं ले पा रहे हैं, जितनी स्वस्थ रहने के लिए आवश्यक होती है। गर्म रातों में तापमान अधिक होने के कारण लोगों की नींद बार-बार टूटती है और पर्याप्त आराम नहीं मिल पाता। शोधों में भी पाया गया है कि बढ़ती गर्मी के कारण औसतन लोगों की नींद प्रभावित होती है।पर्याप्त नींद न मिलने का असर शारीरिक स्वास्थ्य, मानसिक स्वास्थ्य, एकाग्रता, कार्यक्षमता और उत्पादकता पर पड़ता है। इससे थकान, चिड़चिड़ापन और तनाव बढ़ सकता है। जब बड़ी संख्या में लोग इस समस्या से प्रभावित होते हैं, तो इसका असर समाज और अर्थव्यवस्था पर भी दिखाई देता है।यही कारण है कि जलवायु परिवर्तन केवल पर्यावरण का मुद्दा नहीं, बल्कि मानव स्वास्थ्य, जीवन की गुणवत्ता और आर्थिक विकास से भी जुड़ा हुआ विषय है। इसलिए समय की मांग है कि हम पर्यावरण संरक्षण, अधिक से अधिक वृक्षारोपण, जल संरक्षण, स्वच्छ ऊर्जा के उपयोग और कार्बन उत्सर्जन को कम करने जैसे कदम उठाएँ। यदि आज हम प्रकृति के प्रति अपनी जिम्मेदारी निभाएँगे, तो आने वाली पीढ़ियों को एक सुरक्षित, स्वस्थ और संतुलित भविष्य दे सकेंगे।

आज दुनिया भर में बढ़ती गर्मी, हीटवेव और मौसम के बदलते स्वरूप का एक बड़ा कारण जलवायु परिवर्तन (Climate Change) माना जा रहा है। वैज्ञानिकों के अनुसार, मानव गतिविधियों से बढ़ने वाली ग्रीनहाउस गैसों के कारण पृथ्वी का औसत तापमान लगातार बढ़ रहा है, जिससे हीटवेव अधिक बार, अधिक तीव्र और अधिक समय तक रहने लगी हैं।इस बढ़ती गर्मी का सबसे बड़ा असर लोगों की नींद पर भी पड़ रहा है। दुनिया भर में बहुत से लोग उतनी अच्छी और पर्याप्त नींद नहीं ले पा रहे हैं, जितनी स्वस्थ रहने के लिए आवश्यक होती है। गर्म रातों में तापमान अधिक होने के कारण लोगों की नींद बार-बार टूटती है और पर्याप्त आराम नहीं मिल पाता। शोधों में भी पाया गया है कि बढ़ती गर्मी के कारण औसतन लोगों की नींद प्रभावित होती है।पर्याप्त नींद न मिलने का असर शारीरिक स्वास्थ्य, मानसिक स्वास्थ्य, एकाग्रता, कार्यक्षमता और उत्पादकता पर पड़ता है। इससे थकान, चिड़चिड़ापन और तनाव बढ़ सकता है। जब बड़ी संख्या में लोग इस समस्या से प्रभावित होते हैं, तो इसका असर समाज और अर्थव्यवस्था पर भी दिखाई देता है।यही कारण है कि जलवायु परिवर्तन केवल पर्यावरण का मुद्दा नहीं, बल्कि मानव स्वास्थ्य, जीवन की गुणवत्ता और आर्थिक विकास से भी जुड़ा हुआ विषय है। इसलिए समय की मांग है कि हम पर्यावरण संरक्षण, अधिक से अधिक वृक्षारोपण, जल संरक्षण, स्वच्छ ऊर्जा के उपयोग और कार्बन उत्सर्जन को कम करने जैसे कदम उठाएँ। यदि आज हम प्रकृति के प्रति अपनी जिम्मेदारी निभाएँगे, तो आने वाली पीढ़ियों को एक सुरक्षित, स्वस्थ और संतुलित भविष्य दे सकेंगे।

हिमाचल का पर्यटन: विकास की दौड़ या विनाश की ओर? : धीरज रमौलसचिव, प्रयास सोसाइटी

प्रयास सोसाइटी के अंतरराष्ट्रीय समाजसेवी रंजीत सिंह टक्कर ने राष्ट्रीय एकता, युवा नेतृत्व एवं समाज सेवा का दिया संदेश

Vrydag 17 Julie 2026

प्राकृतिक खेती: किसानों की समृद्धि और स्वस्थ भविष्य की दिशालेखक: धीरज रमौलसचिव, प्रयास सोसाइटी (PARAYAS Society)आज के समय में बढ़ती खेती लागत, मिट्टी की उर्वरता में कमी, जल संकट और रासायनिक उर्वरकों के अत्यधिक उपयोग ने कृषि के सामने नई चुनौतियाँ खड़ी कर दी हैं। ऐसे समय में प्राकृतिक खेती किसानों के लिए एक टिकाऊ, किफायती और पर्यावरण अनुकूल विकल्प बनकर उभर रही है।प्राकृतिक खेती का उद्देश्य रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों पर निर्भरता कम करना तथा स्थानीय संसाधनों के उपयोग से स्वस्थ एवं सुरक्षित खाद्य उत्पादन करना है। इससे मिट्टी की गुणवत्ता में सुधार होता है, जल संरक्षण को बढ़ावा मिलता है और खेती की लागत भी कम होती है।हिमाचल प्रदेश जैसे पर्वतीय राज्य में प्राकृतिक खेती का विशेष महत्व है। यहाँ छोटे और सीमांत किसान स्थानीय संसाधनों, देशी गाय आधारित कृषि पद्धतियों तथा पारंपरिक ज्ञान का उपयोग कर बेहतर उत्पादन प्राप्त कर सकते हैं। इससे किसानों की आय बढ़ाने के साथ-साथ पर्यावरण संरक्षण और जैव विविधता को भी बढ़ावा मिलता है।प्राकृतिक खेती के साथ-साथ मोटे अनाज (मिलेट्स) जैसे मंडुवा, कोदो, कुट्टू, जौ, मक्का और अन्य पारंपरिक फसलों का उत्पादन भी बढ़ाना आवश्यक है। ये फसलें कम पानी में अच्छी पैदावार देती हैं, पोषक तत्वों से भरपूर होती हैं और जलवायु परिवर्तन की चुनौतियों का सामना करने में सक्षम हैं।सरकार, कृषि विभाग, स्वयंसेवी संस्थाओं और किसानों को मिलकर प्राकृतिक खेती के प्रशिक्षण, प्रदर्शन प्लॉट, किसान जागरूकता कार्यक्रम तथा स्थानीय बाजार उपलब्ध कराने की दिशा में कार्य करना चाहिए। इससे ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूती मिलेगी और युवाओं को कृषि से जोड़ने में भी मदद मिलेगी।प्राकृतिक खेती केवल खेती करने का तरीका नहीं, बल्कि प्रकृति के साथ संतुलित जीवन जीने की एक सोच है। यदि हम आज इस दिशा में कदम बढ़ाते हैं, तो आने वाली पीढ़ियों को स्वस्थ भोजन, सुरक्षित पर्यावरण और समृद्ध कृषि विरासत दे सकेंगे।प्रयास सोसाइटी (PARAYAS Society) के बारे मेंप्रयास सोसाइटी (PARAYAS Society) हिमाचल प्रदेश में कार्यरत एक स्वैच्छिक संस्था है, जिसका मुख्य कार्यालय जिला सिरमौर में स्थित है। संस्था ग्रामीण विकास, प्राकृतिक खेती, जल संरक्षण, पर्यावरण संरक्षण, आजीविका संवर्धन, महिला सशक्तिकरण तथा सामुदायिक जागरूकता के क्षेत्र में कार्य कर रही है। संस्था का उद्देश्य समुदाय की सक्रिय भागीदारी के माध्यम से सतत एवं समावेशी विकास को बढ़ावा देना है।संपर्क करें:📧 Email: societyparayas1@gmail.com📞 Mobile: +91 8219852185#PARAYASSociety #NaturalFarming #Millets #HimachalPradesh #Sirmaur #OrganicFarming #RuralDevelopment #SustainableAgriculture #Environment #ClimateAction

हिमाचल के सूखते प्राकृतिक जल स्रोत: अब नहीं चेते तो आने वाली पीढ़ियाँ करेंगी संघर्षलेखक: धीरज रमौलसचिव, प्रयास सोसाइटी (PARAYAS Society)हिमाचल प्रदेश अपनी नदियों, झरनों, बावड़ियों, चश्मों और प्राकृतिक जल स्रोतों के लिए जाना जाता है। कभी गाँवों की जीवनरेखा रहे ये जल स्रोत आज तेजी से सूखते जा रहे हैं। यह केवल पर्यावरण की समस्या नहीं, बल्कि ग्रामीण जीवन, खेती, पशुपालन और आने वाली पीढ़ियों के भविष्य से जुड़ा गंभीर विषय है।सिरमौर सहित हिमाचल के अनेक क्षेत्रों में वर्षों पुराने प्राकृतिक चश्मों का जल प्रवाह लगातार कम हो रहा है। कई स्थानों पर पारंपरिक जल स्रोत पूरी तरह समाप्त होने की कगार पर हैं। इसके पीछे जलवायु परिवर्तन, अनियोजित विकास, जंगलों की कटाई, वर्षा के बदलते स्वरूप, भूजल का अत्यधिक दोहन तथा अनियंत्रित बोरवेल जैसी अनेक चुनौतियाँ जिम्मेदार हैं।प्राकृतिक जल स्रोत केवल पीने के पानी का साधन नहीं हैं, बल्कि ये हमारी कृषि, जैव विविधता, वन्यजीवों और स्थानीय अर्थव्यवस्था का आधार हैं। यदि इनका संरक्षण नहीं किया गया तो भविष्य में ग्रामीण क्षेत्रों में जल संकट और अधिक गहरा सकता है।इस दिशा में सरकार, पंचायतों, सामाजिक संस्थाओं और स्थानीय समुदायों को मिलकर कार्य करना होगा। वर्षा जल संचयन को बढ़ावा देना, जलग्रहण क्षेत्रों का संरक्षण, अधिक से अधिक पौधारोपण, पारंपरिक बावड़ियों और चश्मों का पुनर्जीवन तथा भूजल के अनियंत्रित दोहन पर प्रभावी नियंत्रण समय की आवश्यकता है।हर नागरिक की भी जिम्मेदारी है कि वह पानी का विवेकपूर्ण उपयोग करे और अपने आसपास के प्राकृतिक जल स्रोतों की सफाई एवं संरक्षण में सक्रिय भागीदारी निभाए। यदि समाज और प्रशासन मिलकर प्रयास करें तो सूखते जल स्रोतों को पुनर्जीवित किया जा सकता है।जल है तो जीवन है। इसलिए आज लिया गया एक छोटा-सा संरक्षण का संकल्प आने वाली पीढ़ियों के सुरक्षित भविष्य की नींव बन सकता है।प्रयास सोसाइटी के बारे मेंप्रयास सोसाइटी (PARAYAS Society) ग्रामीण विकास, जल संरक्षण, प्राकृतिक संसाधन प्रबंधन, पर्यावरण संरक्षण, प्राकृतिक खेती, आजीविका संवर्धन तथा सामुदायिक जागरूकता के क्षेत्र में कार्यरत एक स्वैच्छिक संस्था है। संस्था का उद्देश्य समुदाय की सहभागिता से सतत विकास को बढ़ावा देना है।संपर्क:📧 societyparayas1@gmail.com#PARAYASSociety #WaterConservation #SaveSprings #HimachalPradesh #JalSanrakshan #ClimateChange #RuralDevelopment #Environment

प्राकृतिक खेती एवं लघु अनाजों को बढ़ावा देना समय की आवश्यकता : धीरज रमौल सिरमौर। हिम आरआरए नेटवर्क द्वारा आयोजित एक ऑनलाइन बैठक में प्रयास सोसाइटी के सचिव धीरज रमौल ने प्राकृतिक खेती, देशी बीजों के संरक्षण तथा लघु अनाजों (मिलेट्स) के उत्पादन को बढ़ावा देने का आह्वान किया। बैठक में कृषि क्षेत्र के अनेक विशेषज्ञों, वैज्ञानिकों एवं संसाधन व्यक्तियों (रिसोर्स पर्सनों) ने भाग लेकर टिकाऊ एवं आत्मनिर्भर कृषि व्यवस्था पर विस्तार से विचार-विमर्श किया।बैठक के दौरान प्राकृतिक खेती को बढ़ावा देने, लघु अनाजों के उत्पादन में वृद्धि, देशी एवं पारंपरिक बीजों के संरक्षण तथा किसानों की आय बढ़ाने जैसे महत्वपूर्ण विषयों पर विस्तार से चर्चा हुई। विशेषज्ञों ने कहा कि प्राकृतिक खेती न केवल भूमि की उर्वरता और पर्यावरण संरक्षण में सहायक है, बल्कि यह किसानों की उत्पादन लागत को भी कम करती है। वहीं, मोटे अनाज (मिलेट्स) पोषण सुरक्षा सुनिश्चित करने के साथ-साथ जलवायु परिवर्तन की चुनौतियों से निपटने में भी अत्यंत उपयोगी सिद्ध हो रहे हैं।इस अवसर पर प्रयास सोसाइटी के सचिव धीरज रमौल ने कहा कि किसानों को अधिक से अधिक देशी एवं स्थानीय बीजों का उपयोग करना चाहिए तथा अपने स्तर पर गुणवत्तापूर्ण बीज तैयार करने की दिशा में भी प्रयास करने चाहिए। उन्होंने कहा कि देशी बीज हमारी कृषि परंपरा की अमूल्य धरोहर हैं और इनके संरक्षण से किसान आत्मनिर्भर बनेंगे, खेती की लागत घटेगी तथा आने वाली पीढ़ियों के लिए जैव विविधता भी सुरक्षित रहेगी।धीरज रमौल ने कहा कि वर्तमान समय में प्राकृतिक खेती और लघु अनाजों को बढ़ावा देना केवल किसानों के हित में ही नहीं, बल्कि पर्यावरण संरक्षण, पोषण सुरक्षा और सतत विकास के लिए भी अत्यंत आवश्यक है। उन्होंने सभी किसानों, स्वयंसेवी संस्थाओं तथा संबंधित विभागों से इस दिशा में मिलकर कार्य करने का आह्वान किया।बैठक के अंत में सभी प्रतिभागियों ने प्राकृतिक खेती, देशी बीजों के संरक्षण तथा लघु अनाजों के उत्पादन को बढ़ावा देने के लिए सामूहिक रूप से कार्य करने का संकल्प लिया।

पलायन नहीं, ग्राम पुनर्जीवन चाहिए : हिमाचल प्रदेश का भविष्य गांवों से ही निकलेगा : धीरज रमौलसचिव, प्रयास सोसाइटी

विज्ञान के साथ संस्कार और प्रकृति का सम्मान ही बनाएगा हिमाचल का उज्ज्वल भविष्य : धीरज रमौल

विज्ञान के साथ संस्कार और प्रकृति का सम्मान ही बनाएगा हिमाचल का उज्ज्वल भविष्य : धीरज रमौल आधुनिक तकनीक अपनाएं, लेकिन अपनी जड़ों से रिश्ता न...