विश्व श्रव्य-दृश्य विरासत दिवस पर प्रयास सोसाइटी सिरमौर के सचिव ने दिया सांस्कृतिक एवं ऐतिहासिक धरोहरों को सहेजने का संदेश
सिरमौर, 27 अक्टूबर। विश्व श्रव्य-दृश्य विरासत दिवस के अवसर पर प्रयास सोसाइटी सिरमौर के सचिव धीरज रमौल ने कहा कि किसी भी समाज की पहचान उसकी संस्कृति, इतिहास, परंपराओं और पारंपरिक ज्ञान से होती है। हमारी ये धरोहरें केवल अतीत की यादें नहीं, बल्कि हमारी सामाजिक पहचान, सांस्कृतिक मूल्यों और आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा का महत्वपूर्ण आधार हैं। इसलिए इनका संरक्षण करना हम सभी की सामूहिक जिम्मेदारी है।
धीरज रमौल ने कहा कि प्रत्येक वर्ष 27 अक्टूबर को विश्व श्रव्य-दृश्य विरासत दिवस मनाया जाता है। इस दिवस का मुख्य उद्देश्य पुरानी फिल्मों, रेडियो प्रसारणों, टेलीविजन कार्यक्रमों, ध्वनि रिकॉर्डिंग, ऐतिहासिक तस्वीरों और अन्य श्रव्य-दृश्य अभिलेखों के संरक्षण के प्रति लोगों को जागरूक करना है। ये अभिलेख बीते समय की घटनाओं, सामाजिक परिस्थितियों, जीवनशैली और सांस्कृतिक विकास को समझने के महत्वपूर्ण माध्यम हैं।
उन्होंने कहा कि हिमाचल प्रदेश विशेष रूप से जिला सिरमौर की समृद्ध लोकसंस्कृति हमारी अमूल्य विरासत है। यहां के पारंपरिक लोकगीत, लोकनृत्य, लोककथाएं, स्थानीय बोलियां, ऐतिहासिक स्थल, मेले, त्योहार, रीति-रिवाज और पारंपरिक जीवनशैली हमारी सांस्कृतिक पहचान को विशिष्ट बनाते हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में बुजुर्गों के पास मौजूद पारंपरिक ज्ञान, प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण के तरीके और सदियों से चली आ रही जीवन पद्धतियां भी हमारी धरोहर का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं।
उन्होंने चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि आधुनिकता और बदलती जीवनशैली के कारण कई पारंपरिक कलाएं, लोकगीत, बोलियां और पुरानी परंपराएं धीरे-धीरे विलुप्त होने के कगार पर हैं। ऐसे में इनके संरक्षण के लिए केवल मौखिक प्रयास पर्याप्त नहीं हैं, बल्कि इनका व्यवस्थित दस्तावेजीकरण और डिजिटल रिकॉर्ड तैयार करना भी जरूरी है, ताकि भविष्य में नई पीढ़ियां अपनी सांस्कृतिक जड़ों से परिचित रह सकें।
धीरज रमौल ने युवाओं, शिक्षण संस्थानों और सामाजिक संगठनों से आह्वान किया कि वे अपने-अपने क्षेत्रों की पुरानी तस्वीरों, ऐतिहासिक घटनाओं, लोकगीतों, लोककथाओं, पारंपरिक जलस्रोतों, स्थानीय बोलियों और बुजुर्गों के अनुभवों को ऑडियो, वीडियो एवं लिखित माध्यमों से सुरक्षित करने में योगदान दें। विद्यालयों और महाविद्यालयों में भी सांस्कृतिक विरासत से संबंधित जागरूकता कार्यक्रम, प्रतियोगिताएं और स्थानीय इतिहास के संकलन जैसी गतिविधियां आयोजित की जानी चाहिए।
उन्होंने कहा कि विकास और आधुनिक तकनीक को अपनाना समय की आवश्यकता है, लेकिन इसके साथ अपनी संस्कृति, प्रकृति, परंपराओं और ऐतिहासिक जड़ों से जुड़े रहना भी उतना ही महत्वपूर्ण है। जिस समाज को अपने इतिहास और विरासत का ज्ञान होता है, वही अपनी पहचान को मजबूत रखते हुए भविष्य की दिशा तय कर सकता है।
अंत में प्रयास सोसाइटी सिरमौर के सचिव धीरज रमौल ने आमजन से अपील की कि वे अपनी सांस्कृतिक, ऐतिहासिक और श्रव्य-दृश्य धरोहरों के संरक्षण को सामाजिक जिम्मेदारी के रूप में अपनाएं और अपने क्षेत्र की विरासत को संजोने के लिए आगे आएं, ताकि हमारी समृद्ध संस्कृति और परंपराएं आने वाली पीढ़ियों तक सुरक्षित पहुंच सकें।
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