विकास वित्त व्यवस्था में सामाजिक संस्थाओं की भागीदारी बढ़ाने पर राष्ट्रीय कार्यशाला, हिमाचल और उत्तराखंड के संगठनों ने उठाए अहम मुद्दे
नई दिल्ली में आयोजित दो दिवसीय कार्यशाला में विकास वित्त संस्थानों से जुड़ाव, बजट विश्लेषण, पारदर्शिता और ग्रामीण सामाजिक संगठनों को तकनीकी एवं वित्तीय सहयोग उपलब्ध करवाने पर हुआ मंथन
नई दिल्ली, 29 अक्टूबर। विकास वित्त व्यवस्था में नागरिक समाज संगठनों की प्रभावी भागीदारी सुनिश्चित करने और उन्हें राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय विकास वित्त संस्थानों से जोड़ने के उद्देश्य से स्वैच्छिक कार्रवाई नेटवर्क इंडिया (वाणी) की ओर से 28 और 29 अक्टूबर को नई दिल्ली स्थित विश्व युवा केंद्र में दो दिवसीय राष्ट्रीय कार्यशाला का आयोजन किया गया। कार्यशाला में दिल्ली सहित राजस्थान, झारखंड, बिहार, उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश, मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र समेत विभिन्न राज्यों से लगभग 35 नागरिक समाज संगठनों (सीएसओ) के प्रतिनिधियों ने भाग लिया। इस दौरान विकास वित्त संस्थानों और जमीनी स्तर पर कार्यरत सामाजिक संगठनों के बीच बेहतर समन्वय, पारदर्शिता, तकनीकी सहयोग और निर्णय प्रक्रिया में भागीदारी बढ़ाने से जुड़े विषयों पर विस्तार से चर्चा हुई।
कार्यशाला में हिमाचल प्रदेश से प्रयास सोसाइटी सिरमौर के सचिव धीरज रमौल और ड्राईव एनबीओ के निदेशक नरेश कुमार ने भाग लिया। वहीं उत्तराखंड से ग्राम विकास सोसाइटी के मुख्य कार्यकारी अधिकारी एवं सचिव तथा वाणी के राष्ट्रीय बोर्ड सदस्य राज बहादुर सैनी और आदर्श युवा समिति के अध्यक्ष लखबीर सिंह ने सहभागिता की। इन प्रतिनिधियों ने पहाड़ी राज्यों में कार्यरत छोटे और ग्रामीण सामाजिक संगठनों की समस्याओं, जरूरतों और विकास वित्त संस्थानों से जुड़ने की चुनौतियों को सामने रखा।
वाणी के सदस्य संगठनों एवं प्रतिनिधियों की ओर से बिहार के मनोज वर्मा, झारखंड की बबीता कश्यप, मोंटू भाई, शंकर दा, राज बहादुर सैनी तथा मध्य प्रदेश के हेमल कमल सहित विभिन्न राज्यों से आए प्रतिनिधियों ने भी कार्यशाला में सहभागिता की और अपने अनुभव साझा किए।
कार्यशाला में वाणी के मुख्य कार्यकारी अधिकारी हर्ष जैतली सहित अनुसंधान सहायक किरण गोसाईं, कार्यक्रम अधिकारी सुभाषिनी प्रभाकर, संचार अधिकारी नारायणी उपाध्याय, प्रशासनिक अधिकारी धीरज तिवारी तथा कार्यक्रम सहायक हिमांक शर्मा की महत्वपूर्ण भूमिका रही।
कार्यशाला के दौरान किरण गोसाईं ने भारतीय सामाजिक संगठनों की वैश्विक एवं क्षेत्रीय विकास वित्त व्यवस्था में भागीदारी पर तैयार आधारभूत अध्ययन प्रस्तुत किया। इस अध्ययन का उद्देश्य यह समझना था कि भारतीय सामाजिक संगठन विकास वित्त संस्थानों के बारे में कितनी जानकारी रखते हैं, उनकी वित्तपोषित परियोजनाओं से किस स्तर पर जुड़े हैं और अंतरराष्ट्रीय विकास वित्त मंचों में उनकी भागीदारी कितनी है। देश के 60 सामाजिक संगठनों पर आधारित सर्वेक्षण के अनुसार केवल 18.4 प्रतिशत संगठनों ने विकास वित्त संस्थानों द्वारा वित्तपोषित परियोजनाओं में प्रत्यक्ष भागीदारी की थी, जबकि 78.3 प्रतिशत संगठनों ने पिछले पांच वर्षों में किसी भी अंतरराष्ट्रीय विकास वित्त मंच की बैठक या विचार-विमर्श प्रक्रिया में हिस्सा नहीं लिया था।
अध्ययन में यह भी सामने आया कि 80 प्रतिशत संगठनों को प्रशिक्षण और जानकारी, 75 प्रतिशत को विकास वित्त संस्थानों के साथ संपर्क एवं सहयोग, 71.7 प्रतिशत को वित्तीय सहायता और 68.3 प्रतिशत को संस्थागत क्षमता निर्माण की आवश्यकता है। प्रस्तुति में जानकारी की कमी, जटिल प्रक्रियाओं, सीमित संसाधनों और संस्थानों तक पहुंच न होने को सामाजिक संगठनों की भागीदारी में बड़ी चुनौतियां बताया गया।
अनुसंधान एवं विकासशील देशों के लिए सूचना प्रणाली संस्थान, नई दिल्ली के सह-प्राध्यापक डॉ. प्रियदर्शी दाश ने बहुपक्षीय विकास बैंकों की परियोजनाओं में सामाजिक संगठनों की भूमिका पर विचार रखते हुए कहा कि उनकी भागीदारी केवल परियोजनाओं के क्रियान्वयन या लाभार्थियों तक सेवाएं पहुंचाने तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। उन्हें परियोजनाओं की योजना तैयार करने, प्राथमिकताएं निर्धारित करने, निगरानी और मूल्यांकन जैसी प्रक्रियाओं में भी शामिल किया जाना चाहिए। उन्होंने संगठनों से अपने क्षेत्र के मुद्दों का दस्तावेजीकरण करने, शोध एवं अध्ययन तैयार करने और स्थानीय समस्याओं को व्यापक नीतिगत मुद्दों के रूप में सामने लाने का आह्वान किया।
बजट एवं शासन जवाबदेही केंद्र, नई दिल्ली के कार्यकारी निदेशक वी. आर. रमन ने स्थानीय स्तर से राष्ट्रीय और वैश्विक स्तर तक विकास वित्त को समझने तथा बजट विश्लेषण की आवश्यकता पर चर्चा की। इस दौरान जिला स्तर पर वित्तीय मानचित्रण की व्यवस्था विकसित करने का विचार सामने आया, जिसके माध्यम से सरकारी योजनाओं, पंचायतों, कॉरपोरेट सामाजिक उत्तरदायित्व और राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संसाधनों का एकीकृत आकलन किया जा सके। इससे यह समझने में मदद मिल सकती है कि किसी जिले में कितना वित्त उपलब्ध है, कितना खर्च हो रहा है और किन क्षेत्रों में अभी भी संसाधनों की कमी है।
वाइड एंगल सामाजिक विकास संगठन के सचिव मोंटू अहन्थेम ने मणिपुर के अनुभव साझा करते हुए बताया कि जमीनी स्तर पर समुदायों की भागीदारी, निरंतर संवाद और सामाजिक संगठनों की पहल से स्वास्थ्य, बाल अधिकार, शिक्षा और सामाजिक सुरक्षा जैसे क्षेत्रों में महत्वपूर्ण बदलाव लाए जा सकते हैं। उन्होंने एचआईवी संक्रमण की रोकथाम, नशे से प्रभावित लोगों के अधिकारों, बच्चों की शिक्षा और संरक्षण तथा समुदाय आधारित प्रयासों के उदाहरण प्रस्तुत किए। उन्होंने कहा कि सामाजिक संगठनों को केवल अल्पकालिक परियोजनाओं तक सीमित रखने के बजाय दीर्घकालिक वित्तीय सहयोग, तकनीकी मार्गदर्शन और संस्थागत मजबूती के अवसर उपलब्ध करवाने जरूरी हैं।
कार्यशाला में राज बहादुर सैनी ने छोटे और जमीनी स्तर पर कार्यरत सामाजिक संगठनों की आंतरिक संस्थागत चुनौतियों पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि कई संगठनों के पास वित्तीय प्रबंधन, मानव संसाधन, कानूनी प्रक्रियाओं, प्रशासनिक व्यवस्था और सुशासन से जुड़े कार्यों के लिए विशेषज्ञ उपलब्ध नहीं होते। सीमित बजट और छोटी टीमों के कारण इन सभी जिम्मेदारियों का बोझ कुछ ही लोगों पर आ जाता है। उन्होंने सुझाव दिया कि वाणी जैसी राष्ट्रीय संस्था साझा संस्थागत सहयोग व्यवस्था विकसित करने की दिशा में पहल कर सकती है, जिसके माध्यम से छोटे संगठनों को लेखा-जोखा, कानूनी सलाह, मानव संसाधन प्रबंधन, वित्तीय अनुपालन और क्षमता निर्माण के लिए विशेषज्ञ सहायता उपलब्ध हो सके।
कार्यशाला में हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड से पहुंचे प्रतिनिधियों ने पहाड़ी राज्यों में कार्यरत छोटी ग्रामीण सामाजिक संस्थाओं को विकास वित्त व्यवस्था से जोड़ने की आवश्यकता को महत्वपूर्ण बताया। प्रतिनिधियों का कहना था कि इन राज्यों में सामाजिक संस्थाएं प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण, जल संरक्षण, शिक्षा, स्वास्थ्य, महिला सशक्तिकरण, आजीविका और ग्रामीण विकास जैसे क्षेत्रों में जमीनी स्तर पर महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही हैं। ऐसी संस्थाओं को परियोजनाएं तैयार करने के लिए तकनीकी सहायता, प्रशिक्षण, संस्थागत मार्गदर्शन और छोटी परियोजनाओं के लिए वित्तीय सहयोग उपलब्ध करवाया जाना चाहिए।
प्रतिभागियों ने वाणी और अन्य राष्ट्रीय संस्थाओं के माध्यम से ऐसी संस्थागत व्यवस्था विकसित करने की आवश्यकता पर भी जोर दिया, जिसके जरिए ग्रामीण क्षेत्रों में कार्यरत छोटे सामाजिक संगठनों को विकास वित्त संस्थानों से सीधे जोड़ा जा सके। इससे जल संरक्षण, प्राकृतिक संसाधनों के प्रबंधन, जलवायु परिवर्तन के प्रभावों से निपटने, शिक्षा, स्वास्थ्य और महिला एवं बाल विकास जैसे क्षेत्रों में स्थानीय जरूरतों के आधार पर प्रभावी परियोजनाएं तैयार करने में मदद मिल सकती है।
कार्यशाला का व्यापक संदेश रहा कि देश के विकास में नागरिक समाज संगठनों की भूमिका मजबूत बनाने के लिए उन्हें केवल वित्तीय सहायता देना पर्याप्त नहीं है, बल्कि जानकारी, तकनीकी सहयोग, संस्थागत क्षमता, आपसी संपर्क और निर्णय प्रक्रिया में वास्तविक भागीदारी के अवसर भी उपलब्ध करवाने होंगे। राष्ट्रीय स्तर पर आयोजित इस कार्यशाला ने विभिन्न राज्यों के सामाजिक संगठनों को एक-दूसरे के अनुभवों से सीखने और विकास वित्त व्यवस्था में अपनी प्रभावी भूमिका सुनिश्चित करने के लिए साझा मंच प्रदान किया।
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