प्रयास सोसाइटी के सचिव धीरज रमौल ने लोगों से किया देशी बीजों और पारंपरिक फसलों के संरक्षण का आह्वान
सिरमौर । प्रयास सोसाइटी के सचिव धीरज रमौल ने हिमाचल प्रदेश के लोगों, विशेषकर किसानों और ग्रामीण समुदायों से देशी बीजों एवं पारंपरिक फसलों के संरक्षण के लिए आगे आने का आग्रह किया है। उन्होंने कहा कि हमारे पारंपरिक बीज और फसलें केवल खेती का हिस्सा नहीं हैं, बल्कि प्रदेश की कृषि संस्कृति, जैव विविधता, स्थानीय ज्ञान और आने वाली पीढ़ियों की खाद्य सुरक्षा की अमूल्य धरोहर हैं।
धीरज रमौल ने कहा कि आधुनिक कृषि के बढ़ते प्रभाव के कारण कई पारंपरिक फसलें और स्थानीय बीज धीरे-धीरे खेतों से गायब होते जा रहे हैं। पहले गांवों में किसान अपनी फसलों के बीज स्वयं सुरक्षित रखते थे और एक-दूसरे के साथ बीजों का आदान-प्रदान भी करते थे। आज यह परंपरा कमजोर होती जा रही है, जिसके कारण कई स्थानीय किस्मों के अस्तित्व पर खतरा मंडरा रहा है।
उन्होंने लोगों से निवेदन किया कि यदि किसी किसान या परिवार के पास पुरानी देशी मक्की, रागी, कुल्थ, चौलाई, कुट्टू, फाफरा, दालों अथवा अन्य पारंपरिक फसलों के बीज उपलब्ध हैं, तो उन्हें नष्ट न करें और आने वाली पीढ़ियों के लिए सुरक्षित रखें।
धीरज रमौल ने कहा कि विशेष रूप से सिरमौर जिले के ग्रामीण क्षेत्रों में अभी भी कई परिवारों के पास पारंपरिक बीजों और खेती से जुड़ा पुराना ज्ञान मौजूद है। बुजुर्ग किसानों के पास बीजों को सुरक्षित रखने, बुवाई करने और स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार फसल उगाने का जो अनुभव है, उसे भी दर्ज किया जाना चाहिए।
उन्होंने कहा कि हर गांव में स्थानीय स्तर पर 'देशी बीज बैंक' बनाने की पहल की जा सकती है। इसमें किसानों द्वारा उपलब्ध करवाए गए पारंपरिक बीजों को सुरक्षित रखा जाए और उनका संरक्षण एवं समय-समय पर पुनः उत्पादन किया जाए। इससे स्थानीय बीजों की अगली पीढ़ी तक निरंतर उपलब्धता सुनिश्चित की जा सकती है।
उन्होंने किसानों से यह भी अपील की कि पारंपरिक फसलों को केवल इसलिए न छोड़ें क्योंकि उनका बाजार सीमित है। यदि ग्रामीण समुदाय मिलकर इन फसलों का उत्पादन, प्रसंस्करण और स्थानीय स्तर पर बिक्री शुरू करे तो इससे किसानों की आय बढ़ाने के साथ-साथ स्थानीय खाद्य संस्कृति को भी मजबूत किया जा सकता है।
धीरज रमौल ने कहा कि जलवायु परिवर्तन, अनियमित वर्षा और पानी की बढ़ती कमी के दौर में स्थानीय परिस्थितियों के अनुकूल पारंपरिक फसलों का महत्व और अधिक बढ़ गया है। इसलिए देशी बीजों का संरक्षण भविष्य की कृषि और खाद्य सुरक्षा के लिए भी आवश्यक है।
उन्होंने युवाओं, महिला मंडलों, स्वयं सहायता समूहों, पंचायत प्रतिनिधियों और स्कूलों से भी इस अभियान से जुड़ने की अपील की। उन्होंने कहा कि बच्चों और युवाओं को अपनी पारंपरिक फसलों और स्थानीय कृषि विरासत से जोड़ना समय की जरूरत है।
धीरज रमौल ने लोगों से भावनात्मक अपील करते हुए कहा, “अपने घर में रखे पुराने देशी बीजों को संभालकर रखें। हो सकता है कि आज हमें उनका महत्व कम दिखाई दे, लेकिन आने वाली पीढ़ियों के लिए यही बीज हमारी सबसे बड़ी कृषि विरासत बन सकते हैं। एक किसान एक देशी बीज बचाए और उसे आगे बढ़ाए, तो हम मिलकर अपनी पारंपरिक कृषि को फिर से मजबूत कर सकते हैं।”
उन्होंने कहा कि प्रयास सोसाइटी देशी बीजों और पारंपरिक फसलों के संरक्षण के लिए लोगों में जागरूकता पैदा करने तथा सामुदायिक स्तर पर इस दिशा में प्रयास करने के लिए प्रतिबद्ध है।
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