Maandag 21 September 2026

कम बारिश से प्राकृतिक जलस्रोतों पर बढ़ा दबाव, संरक्षण को जनअभियान बनाना जरूरी: धीरज रमौल

चश्मों, बावड़ियों और पारंपरिक जलस्रोतों के संरक्षण के साथ कैचमेंट एरिया पर भी देना होगा ध्यान

सिरमौर, 20 सितंबर। इस वर्ष बारिश अपेक्षाकृत कम होने के कारण पहाड़ी क्षेत्रों के प्राकृतिक जलस्रोतों में पानी का स्तर अपेक्षा के अनुरूप नहीं बढ़ पाया है। कई क्षेत्रों में प्राकृतिक चश्मों और पारंपरिक जलस्रोतों में पानी की उपलब्धता प्रभावित हुई है। ऐसे में भविष्य में जल संकट की स्थिति से बचने के लिए प्राकृतिक जलस्रोतों के संरक्षण और संवर्धन को प्राथमिकता देना जरूरी हो गया है।
प्रयास सोसाइटी के सचिव धीरज रमौल ने कहा कि पहाड़ी क्षेत्रों में प्राकृतिक चश्मे, बावड़ियां और अन्य पारंपरिक जलस्रोत सदियों से ग्रामीण जीवन का महत्वपूर्ण आधार रहे हैं। इन जलस्रोतों से पेयजल सहित ग्रामीणों की कई आवश्यकताएं पूरी होती रही हैं। बदलते मौसम, कम बारिश, जलस्रोतों के आसपास हो रहे बदलाव और उनके कैचमेंट क्षेत्रों के प्रभावित होने के कारण इन प्राकृतिक स्रोतों के संरक्षण की आवश्यकता पहले से अधिक बढ़ गई है।
उन्होंने कहा कि इस वर्ष बारिश कम होने के कारण जिन प्राकृतिक जलस्रोतों में सामान्य परिस्थितियों में पानी का स्तर बढ़ना चाहिए था, वहां अपेक्षित बढ़ोतरी नहीं हो पाई। यह स्थिति आने वाले समय के लिए एक महत्वपूर्ण संकेत है। केवल बारिश पर निर्भर रहने के बजाय वर्षा जल को रोकने, जमीन में पानी का रिचार्ज बढ़ाने और प्राकृतिक जलस्रोतों के कैचमेंट क्षेत्रों को सुरक्षित रखने की दिशा में लगातार प्रयास करने होंगे।

जलस्रोतों की पहचान और मैपिंग की जरूरत

धीरज रमौल ने कहा कि प्रत्येक गांव में मौजूद प्राकृतिक चश्मों, बावड़ियों और पुराने जलस्रोतों की पहचान कर उनका रिकॉर्ड तैयार किया जाना चाहिए। इनमें से कौन-सा जलस्रोत सक्रिय है, कौन-सा कमजोर हो रहा है और कौन-सा सूखने की स्थिति में है, इसकी जानकारी पंचायत स्तर पर उपलब्ध होनी चाहिए। इससे जरूरत के अनुसार संरक्षण की प्राथमिकता तय करने में मदद मिलेगी।
उन्होंने कहा कि जलस्रोतों के संरक्षण के साथ उनके कैचमेंट एरिया पर भी विशेष ध्यान देना जरूरी है। जलस्रोत के आसपास पौधरोपण, मिट्टी एवं नमी संरक्षण, छोटे जल-संचयन ढांचे तथा वर्षा जल को जमीन में उतारने के प्रयास किए जाएं तो प्राकृतिक जलस्रोतों के रिचार्ज में मदद मिल सकती है।
स्थानीय लोगों और युवाओं की भागीदारी जरूरी
प्रयास सोसाइटी के सचिव ने कहा कि जल संरक्षण केवल सरकार या किसी एक विभाग की जिम्मेदारी नहीं है। पंचायतों, महिला मंडलों, युवक मंडलों, स्कूलों, स्वयंसेवी संस्थाओं और स्थानीय ग्रामीणों की सामूहिक भागीदारी से ही जलस्रोतों को लंबे समय तक सुरक्षित रखा जा सकता है।
उन्होंने युवाओं से भी आह्वान किया कि वे अपने गांव के प्राकृतिक जलस्रोतों की जानकारी एकत्र करने, उनकी स्वच्छता बनाए रखने, पौधरोपण और जल संरक्षण गतिविधियों में सक्रिय भूमिका निभाएं। स्कूलों में बच्चों को स्थानीय जलस्रोतों के महत्व से जोड़कर ‘जल प्रहरी’ जैसी जागरूकता गतिविधियां भी शुरू की जा सकती हैं।

पुरानी जल परंपराओं को भी संरक्षित करने की जरूरत

धीरज रमौल ने कहा कि ग्रामीण क्षेत्रों में कई ऐसे पुराने चश्मे और बावड़ियां हैं, जिनका इतिहास और उपयोग स्थानीय बुजुर्गों को पता है। इनकी जानकारी को भी दस्तावेज के रूप में सुरक्षित किया जाना चाहिए, ताकि आने वाली पीढ़ियां अपने पारंपरिक जलस्रोतों और उनसे जुड़ी जल संरक्षण की स्थानीय परंपराओं को समझ सकें।
उन्होंने कहा कि “जल स्रोत बचेंगे तो गांव बचेगा” केवल एक नारा नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के सुरक्षित भविष्य से जुड़ी जिम्मेदारी है। यदि आज प्राकृतिक जलस्रोतों के संरक्षण, वर्षा जल संचयन और जल रिचार्ज की दिशा में सामूहिक प्रयास किए जाते हैं, तो भविष्य में ग्रामीण क्षेत्रों में जल संकट के प्रभाव को कम करने में मदद मिल सकती है।
धीरज रमौल ने कहा कि प्रयास सोसाइटी स्थानीय लोगों, युवाओं और संबंधित संस्थाओं के सहयोग से प्राकृतिक जलस्रोतों के संरक्षण को लेकर जनजागरूकता को आगे बढ़ाने के लिए प्रयासरत रहेगी। उन्होंने ग्रामीणों से अपने-अपने क्षेत्र के चश्मों, बावड़ियों और अन्य पारंपरिक जलस्रोतों की पहचान कर उनके संरक्षण के लिए सामूहिक पहल करने का आह्वान किया।
यह रिपोर्ट आगे चलकर प्रयास सोसाइटी के “जल स्रोत बचाओ अभियान” की पहली कड़ी के रूप में भी इस्तेमाल की जा सकती है - बाद में सर्वेक्षण, जलस्रोत सफाई, पौधरोपण या रिचार्ज कार्य हों तो उन्हें इसी अभियान से जोड़ा जा सकेगा।


Vrydag 11 September 2026

विज्ञान के साथ संस्कार और प्रकृति का सम्मान ही बनाएगा हिमाचल का उज्ज्वल भविष्य : धीरज रमौल


विज्ञान के साथ संस्कार और प्रकृति का सम्मान ही बनाएगा हिमाचल का उज्ज्वल भविष्य : धीरज रमौल

आधुनिक तकनीक अपनाएं, लेकिन अपनी जड़ों से रिश्ता न टूटने दें।
हिमाचल का भविष्य केवल बड़ी परियोजनाओं और आधुनिक विकास में नहीं, बल्कि स्वच्छ जल, सुरक्षित जंगल, उपजाऊ जमीन, मजबूत किसान, सशक्त महिलाएं, शिक्षित युवा और समृद्ध हिमाचली संस्कृति में भी है।
प्रयास सोसाइटी के सचिव धीरज रमौल ने कहा कि विज्ञान और तकनीक को प्रकृति के संरक्षण, प्राकृतिक खेती, स्थानीय एवं पारंपरिक बीजों के संरक्षण, जल स्रोतों के पुनर्जीवन और युवाओं के बेहतर भविष्य के लिए उपयोग किया जाना चाहिए।
उन्होंने कहा कि हमें ऐसा हिमाचल बनाना है, जहां विज्ञान की ऊंचाई के साथ संस्कारों की गहराई और विकास की गति के साथ प्रकृति का संतुलन बना रहे।
📰 विस्तृत समाचार अखबार की कटिंग में पढ़ें।
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Donderdag 10 September 2026

पहाड़ी क्षेत्रों के विकास, वर्षा आधारित कृषि और प्राकृतिक खेती को बढ़ावा देने की पहल; स्थानीय व पारंपरिक बीजों का जुटाया जा रहा विस्तृत आंकड़ा

भरोग बनेड़ी बनेगा बीज ग्राम, 151 किसानों तक पहुंचा प्रयास सोसाइटी का कृषि सर्वेक्षण

पहाड़ी क्षेत्रों के विकास, वर्षा आधारित कृषि और प्राकृतिक खेती को बढ़ावा देने की पहल; स्थानीय व पारंपरिक बीजों का जुटाया जा रहा विस्तृत आंकड़ा

सिरमौर, 09 सितंबर । भरोग बनेड़ी गांव को बीज ग्राम के रूप में विकसित करने की दिशा में प्रयास सोसाइटी द्वारा कृषि एवं पारंपरिक बीजों को लेकर आधारभूत सर्वेक्षण किया जा रहा है। पहाड़ी क्षेत्र विकास के लिए व्यावसायिक सहायता संस्था (पीएएचएडी ट्रस्ट) तथा हिमाचल पुनर्जीवित वर्षा आधारित कृषि नेटवर्क (हिमआरआरए) के सहयोग से चल रहे इस सर्वेक्षण के तहत अब तक 151 किसानों से संपर्क कर उनकी कृषि व्यवस्था, फसलों, स्थानीय किस्मों और पारंपरिक बीजों से संबंधित महत्वपूर्ण जानकारी जुटाई जा चुकी है।
सर्वेक्षण के प्रथम चरण में प्रयास सोसाइटी की टीम ने 101 किसानों से बातचीत कर उनकी कृषि व्यवस्था, फसलों, स्थानीय किस्मों और बीजों से संबंधित प्रारंभिक जानकारी एकत्रित की। इसके बाद दूसरे चरण में 50 किसानों से विस्तृत बातचीत कर निर्धारित सर्वेक्षण प्रपत्र भरने का कार्य किया गया। इस प्रकार दोनों चरणों में अब तक कुल 151 किसानों तक पहुंच बनाई जा चुकी है।
प्रयास सोसाइटी के सचिव धीरज रमौल ने बताया कि सर्वेक्षण का उद्देश्य केवल किसानों की संख्या दर्ज करना नहीं है, बल्कि भरोग बनेड़ी गांव में उपलब्ध स्थानीय एवं पारंपरिक बीजों, फसल विविधता तथा किसानों द्वारा वर्षों से अपनाई जा रही बीज संरक्षण की परंपरा को समझना और उसका व्यवस्थित दस्तावेजीकरण करना है।
उन्होंने बताया कि सर्वेक्षण के दौरान किसानों से उनकी भूमि का कुल क्षेत्रफल, सिंचित एवं वर्षा आधारित भूमि, बीज उत्पादन के लिए उपलब्ध भूमि तथा खेतों में उगाई जा रही विभिन्न फसलों और उनकी स्थानीय किस्मों के बारे में जानकारी ली जा रही है। इसके साथ ही प्रत्येक फसल का क्षेत्रफल, कितने वर्षों से उसकी खेती की जा रही है तथा किसानों के पास उपलब्ध बीज की अनुमानित मात्रा सहित विभिन्न कृषि संबंधी विवरण भी दर्ज किए जा रहे हैं।
सर्वेक्षण में यह भी जानकारी जुटाई जा रही है कि किसान अपने बीज स्वयं सुरक्षित रखते हैं अथवा बाजार से खरीदते हैं। साथ ही यह जानने का प्रयास किया जा रहा है कि कोई बीज कितने वर्षों से परिवार के पास सुरक्षित है और क्या कोई पारंपरिक बीज कई पीढ़ियों से परिवार में चला आ रहा है।
धीरज रमौल ने कहा कि स्थानीय बीजों की पहचान केवल उनकी उपलब्धता तक सीमित नहीं है। सर्वेक्षण के माध्यम से यह भी समझने का प्रयास किया जा रहा है कि विभिन्न पारंपरिक बीज सूखा, पाला, ओलावृष्टि, हिमपात और अत्यधिक वर्षा जैसी स्थानीय परिस्थितियों में किस प्रकार प्रदर्शन करते हैं। इससे भविष्य में किसानों के लिए अधिक उपयुक्त, टिकाऊ और स्थानीय परिस्थितियों के अनुकूल फसल किस्मों की पहचान करने में मदद मिलेगी।
उन्होंने कहा कि भरोग बनेड़ी जैसे पहाड़ी गांवों में किसानों के पास वर्षों से संरक्षित अनेक स्थानीय बीज और पारंपरिक कृषि ज्ञान मौजूद हैं। यदि इनका समय रहते दस्तावेजीकरण, संरक्षण और संवर्धन किया जाए तो यह क्षेत्र की कृषि जैव-विविधता को बचाने के साथ-साथ किसानों की आत्मनिर्भरता को भी मजबूत कर सकता है।

प्रशिक्षण और तकनीकी सहयोग की जरूरत भी समझी जा रही

सर्वेक्षण के दौरान किसानों की प्रशिक्षण, तकनीकी मार्गदर्शन, मिट्टी परीक्षण, बीज परीक्षण, बीज भंडारण, विपणन तथा सामुदायिक बीज बैंक से संबंधित आवश्यकताओं को भी समझा जा रहा है। इसके अलावा किसानों की बीज उत्पादन का रिकॉर्ड रखने, खेतों का समय-समय पर निरीक्षण कराने, बीज की गुणवत्ता बनाए रखने तथा पारंपरिक बीजों को लंबे समय तक सुरक्षित रखने की क्षमता और रुचि का भी आकलन किया जा रहा है।
पीएएचएडी ट्रस्ट और हिमआरआरए के सहयोग से आगे बढ़ रही पहल
प्रयास सोसाइटी के सचिव धीरज रमौल ने बताया कि इस महत्वपूर्ण कार्य में पीएएचएडी ट्रस्ट के निदेशक एवं हिमआरआरए के राज्य प्रभारी अनूप कुमार का मार्गदर्शन और सहयोग प्राप्त हो रहा है। वहीं पीएएचएडी ट्रस्ट की कृषि सलाहकार कर्मण्या जसरोतिया द्वारा कृषि संबंधी तकनीकी मार्गदर्शन प्रदान किया जा रहा है।
उन्होंने कहा कि पीएएचएडी ट्रस्ट और हिमआरआरए के सहयोग से पहाड़ी क्षेत्रों में वर्षा आधारित कृषि, प्राकृतिक खेती, स्थानीय कृषि संसाधनों के संरक्षण और किसानों की क्षमता बढ़ाने की दिशा में कार्य किया जा रहा है। इसी कड़ी में भरोग बनेड़ी में किया जा रहा सर्वेक्षण भविष्य की कृषि योजना तैयार करने में महत्वपूर्ण आधार साबित होगा।
इसके साथ ही कृषि प्रौद्योगिकी एवं विपणन एजेंसी (एटीएमए) के अंतर्गत राजीव गांधी प्राकृतिक खेती कौशल किसान योजना से जुड़े प्रयासों के माध्यम से भी प्राकृतिक एवं टिकाऊ कृषि को बढ़ावा देने की दिशा में कार्य किया जा रहा है।

151 किसानों तक पहुंचना महत्वपूर्ण उपलब्धि

धीरज रमौल ने कहा कि अब तक 151 किसानों तक पहुंच बनाना सर्वेक्षण की महत्वपूर्ण शुरुआत है। सर्वेक्षण से प्राप्त आंकड़ों के आधार पर भरोग बनेड़ी में उपलब्ध स्थानीय फसलों, पारंपरिक बीजों और कृषि पद्धतियों की वास्तविक स्थिति का आकलन किया जाएगा। इसके बाद किसानों की आवश्यकता के अनुसार प्रशिक्षण, तकनीकी सहयोग, बीज संरक्षण और अन्य गतिविधियों के लिए आगे की कार्ययोजना तैयार की जाएगी।
उन्होंने कहा कि प्रयास सोसाइटी का उद्देश्य किसानों की पारंपरिक बीज संपदा को पहचान, संरक्षण और उचित मंच प्रदान करना है। संस्था का प्रयास है कि गांव में “किसान का बीज, किसान के खेत और किसान के हाथ में बीज की पहचान” को मजबूत किया जाए।
उन्होंने कहा कि स्थानीय बीजों का संरक्षण केवल कृषि तक सीमित विषय नहीं है, बल्कि यह कृषि जैव-विविधता, खाद्य सुरक्षा, पारंपरिक ज्ञान और आने वाली पीढ़ियों के भविष्य से भी जुड़ा हुआ है। यदि स्थानीय स्तर पर उपलब्ध पारंपरिक बीजों का समय रहते संरक्षण, संवर्धन और दस्तावेजीकरण किया जाता है तो भरोग बनेड़ी को एक आदर्श बीज ग्राम के रूप में विकसित करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम उठाया जा सकता है।



Donderdag 27 Augustus 2026

साढ़े तीन साल से बिजली संकट की मार झेल रहा ददाहू-धारटीधार क्षेत्र

स्टाफ की कमी, बरसात में टूटती तारों और क्षतिग्रस्त पोलों से बढ़ी परेशानी; धीरज रमौल ने सरकार से नियमित कटाई-छंटाई, पर्याप्त कर्मचारियों और स्थायी समाधान की मांग की

सिरमौर। हिमाचल प्रदेश के जिला सिरमौर के ददाहू और धारटीधार क्षेत्र में पिछले करीब साढ़े तीन वर्षों से बिजली की समस्या लगातार बनी हुई है। बार-बार बिजली गुल होने, बरसात के दौरान तारें टूटने और बिजली के पोल क्षतिग्रस्त होने तथा खराबी को ठीक करने में लगने वाले लंबे समय के कारण क्षेत्र के लोगों को भारी परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है। इसके बावजूद अभी तक इस समस्या का कोई स्थायी समाधान नहीं हो पाया है।
प्रयास सोसाइटी के सचिव धीरज रमौल ने कहा कि बिजली की समस्या आने पर आम लोग अक्सर बिजली विभाग के फील्ड कर्मचारियों, जेई और एसडीओ को फोन करते हैं। इसमें कोई दो राय नहीं है कि विभाग के कर्मचारी उपलब्ध संसाधनों के बीच अपनी जिम्मेदारी बखूबी निभा रहे हैं और लोगों की समस्याओं को दूर करने का प्रयास करते हैं। इसलिए फील्ड में काम करने वाले छोटे कर्मचारियों को दोष देना समस्या का समाधान नहीं है।
उन्होंने कहा कि असली समस्या व्यवस्था और पर्याप्त स्टाफ की कमी से जुड़ी हुई है। ददाहू और धारटीधार जैसे पहाड़ी क्षेत्रों में बरसात के मौसम में तेज हवाओं, भारी बारिश और पेड़ों के गिरने के कारण कई बार बिजली की तारें टूट जाती हैं तथा पोल भी क्षतिग्रस्त हो जाते हैं। ऐसी स्थिति में बिजली व्यवस्था को जल्द बहाल करने के लिए पर्याप्त संख्या में कर्मचारियों की आवश्यकता होती है, लेकिन स्टाफ की कमी के कारण खराबी को ठीक करने में काफी समय लग जाता है।
धीरज रमौल ने कहा कि पहले बिजली की तारों के आसपास पेड़ों की बढ़ी हुई टहनियों की समय-समय पर कटाई-छंटाई की जाती थी, ताकि पेड़ों की शाखाएं तारों के संपर्क में आकर बिजली आपूर्ति में बाधा न बनें। लेकिन पिछले करीब पौने चार वर्षों से इस व्यवस्था पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया जा रहा है। कई स्थानों पर पेड़ों की टहनियां बिजली की तारों तक पहुंच चुकी हैं, जिससे बरसात और तेज हवाओं के दौरान बिजली आपूर्ति बाधित होने का खतरा बढ़ जाता है।
उन्होंने कहा कि समस्या केवल खराबी होने के बाद उसे ठीक करने की नहीं, बल्कि खराबी को रोकने के लिए पहले से तैयारी करने की है। यदि बिजली की तारों के आसपास पेड़ों की नियमित कटाई-छंटाई, पुराने एवं कमजोर पोलों की समय-समय पर जांच तथा आवश्यकतानुसार मरम्मत और बदलाव किया जाए, तो बिजली की कई समस्याओं को पहले ही रोका जा सकता है।
धीरज रमौल ने कहा कि ददाहू और धारटीधार क्षेत्र में बड़ी संख्या में लोग नौकरी, मजदूरी, कृषि और अन्य दैनिक कार्यों पर निर्भर हैं। शाम के समय बिजली चले जाने के बाद कई बार रातभर बिजली बहाल नहीं होती, जिससे घरेलू कार्यों, विद्यार्थियों की पढ़ाई, दुकानदारों, छोटे व्यवसायों और रोजमर्रा की जिंदगी पर सीधा असर पड़ता है।
उन्होंने कहा कि बरसात के मौसम में जब कहीं तार टूटती है या पोल गिरता है तो सीमित कर्मचारियों पर ही उसे ठीक करने का दबाव बढ़ जाता है। यदि विभाग के पास पर्याप्त तकनीकी स्टाफ, लाइनमैन और आवश्यक संसाधन उपलब्ध हों तो ऐसी आपात स्थिति में बिजली आपूर्ति को कम समय में बहाल किया जा सकता है।
धीरज रमौल ने प्रदेश सरकार से सवाल किया कि पिछले करीब 40 महीनों में ददाहू और धारटीधार क्षेत्र की बिजली समस्या के स्थायी समाधान के लिए क्या ठोस कदम उठाए गए हैं? उन्होंने कहा कि सरकार और बिजली विभाग को केवल शिकायत आने के बाद कार्रवाई करने की व्यवस्था पर निर्भर रहने के बजाय क्षेत्र की बिजली व्यवस्था की व्यापक समीक्षा करनी चाहिए।
उन्होंने सुझाव दिया कि युवाओं और क्षेत्रवासियों की ओर से मुख्यमंत्री तथा बिजली विभाग के मंत्री को एक मांग पत्र भेजा जाए, जिसमें बिजली की तारों के आसपास पेड़ों की नियमित और समयबद्ध कटाई-छंटाई के लिए स्थायी व्यवस्था एवं नियमित टेंडर लगाने, पर्याप्त संख्या में कर्मचारियों की नियुक्ति/उपलब्धता सुनिश्चित करने, बरसात से पहले बिजली लाइनों और पोलों का निरीक्षण करने, कमजोर पोलों को बदलने तथा आपातकालीन स्थिति में त्वरित मरम्मत दल उपलब्ध करवाने की मांग की जाए।
उन्होंने कहा कि पहाड़ी क्षेत्रों में बिजली व्यवस्था को मजबूत करने के लिए बरसात से पहले प्री-मानसून तैयारी को अनिवार्य किया जाना चाहिए। संवेदनशील स्थानों की पहचान कर वहां अतिरिक्त स्टाफ और आवश्यक सामग्री उपलब्ध रखी जाए, ताकि तार टूटने या पोल गिरने की स्थिति में लोगों को लंबे समय तक बिजली संकट का सामना न करना पड़े।
धीरज रमौल ने स्पष्ट किया कि उनका उद्देश्य किसी कर्मचारी या अधिकारी को दोषी ठहराना नहीं है। फील्ड में काम करने वाले कर्मचारी कठिन परिस्थितियों में अपनी जिम्मेदारी निभा रहे हैं। आवश्यकता इस बात की है कि सरकार और विभाग के उच्च स्तर पर ऐसी प्रभावी व्यवस्था बनाई जाए, जिससे कर्मचारियों की कमी दूर हो और बिजली की समस्या का स्थायी समाधान हो।
उन्होंने कहा, “यदि समय रहते पेड़ों की टहनियों की कटाई-छंटाई, बिजली लाइनों और पोलों की नियमित निगरानी तथा पर्याप्त कर्मचारियों की उपलब्धता सुनिश्चित कर दी जाए, तो बिजली की कई बाधाओं को पहले ही रोका जा सकता है। बरसात में तार टूटने या पोल गिरने की स्थिति में भी पर्याप्त स्टाफ होने से बिजली आपूर्ति जल्द बहाल की जा सकेगी।”
प्रयास सोसाइटी के सचिव धीरज रमौल ने प्रदेश सरकार और बिजली विभाग से मांग की कि सिरमौर जिला के ददाहू और धारटीधार क्षेत्र की लंबे समय से चली आ रही बिजली समस्या को गंभीरता से लिया जाए। स्टाफ की कमी को दूर करने, बिजली लाइनों की नियमित देखरेख, पेड़ों की कटाई-छंटाई, कमजोर पोलों को बदलने तथा बरसात के दौरान त्वरित मरम्मत व्यवस्था को मजबूत कर लोगों को स्थायी एवं प्रभावी राहत प्रदान की जाए।

Dinsdag 25 Augustus 2026

क्यारी के ग्रामीणों की पुकार—गिरि नदी पर पुल कब बनेगा?

क्यारी के ग्रामीणों की पुकार—गिरि नदी पर पुल कब बनेगा?

ग्राम पंचायत छछेती के क्यारी गांव के ग्रामीण वर्षों से गिरि नदी पर स्थायी पुल की मांग कर रहे हैं। बरसात के दिनों में नदी का जलस्तर बढ़ने से स्कूली बच्चों, महिलाओं, बुजुर्गों और मरीजों को जान जोखिम में डालकर नदी पार करनी पड़ती है।

इस गंभीर समस्या को लेकर अखबार में प्रकाशित खबर के माध्यम से एक बार फिर सरकार और प्रशासन का ध्यान आकर्षित किया गया है।

ग्रामीणों की मांग साफ है—अब आश्वासन नहीं, स्थायी समाधान चाहिए।
गिरि नदी पर जल्द से जल्द पुल का निर्माण किया जाए, ताकि क्यारी गांव के लोगों को बरसात के मौसम में जान जोखिम में डालकर नदी पार करने की मजबूरी से निजात मिल सके।

🙏 कृपया इस खबर को अधिक से अधिक शेयर करें, ताकि क्यारी के ग्रामीणों की आवाज सरकार और प्रशासन तक पहुंचे।

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धरती बचाने की मुहिम को मिला जनसहयोग

🌱 धरती बचाने की मुहिम को मिला जनसहयोग 🌳

ग्राम पंचायत भरोग बनेड़ी में प्रयास सोसाइटी द्वारा चलाए गए पौधारोपण अभियान की खबर आज अखबार में प्रकाशित हुई। इस अभियान में एनएसएस स्वयंसेवकों, अध्यापकों, स्थानीय ग्रामीणों एवं वन विभाग के कर्मचारियों ने सक्रिय सहभागिता निभाई।

पर्यावरण संरक्षण में सराहनीय योगदान देने वाले एनएसएस स्वयंसेवकों, अध्यापकों एवं वन विभाग के कर्मचारियों को सम्मानित भी किया गया।

इस महत्वपूर्ण पहल के लिए ग्राम पंचायत भरोग बनेड़ी के प्रधान रामगोपाल शर्मा, प्रयास सोसाइटी के सचिव धीरज रमौल, समन्वयक नरेश कुमार, एनएसएस स्वयंसेवकों, अध्यापकों, वन विभाग के कर्मचारियों एवं सभी सहयोगियों का हार्दिक आभार। 🙏

🌳 एक पेड़ लगाना यानी पृथ्वी के भविष्य को सुरक्षित करना।

💧 पेड़ बचाएं • पानी बचाएं • पृथ्वी बचाएं 🌍

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प्रयास सोसाइटी के सचिव धीरज रमौल ने लोगों से किया देशी बीजों और पारंपरिक फसलों के संरक्षण का आह्वान

प्रयास सोसाइटी के सचिव धीरज रमौल ने लोगों से किया देशी बीजों और पारंपरिक फसलों के संरक्षण का आह्वान

सिरमौर । प्रयास सोसाइटी के सचिव धीरज रमौल ने हिमाचल प्रदेश के लोगों, विशेषकर किसानों और ग्रामीण समुदायों से देशी बीजों एवं पारंपरिक फसलों के संरक्षण के लिए आगे आने का आग्रह किया है। उन्होंने कहा कि हमारे पारंपरिक बीज और फसलें केवल खेती का हिस्सा नहीं हैं, बल्कि प्रदेश की कृषि संस्कृति, जैव विविधता, स्थानीय ज्ञान और आने वाली पीढ़ियों की खाद्य सुरक्षा की अमूल्य धरोहर हैं।
धीरज रमौल ने कहा कि आधुनिक कृषि के बढ़ते प्रभाव के कारण कई पारंपरिक फसलें और स्थानीय बीज धीरे-धीरे खेतों से गायब होते जा रहे हैं। पहले गांवों में किसान अपनी फसलों के बीज स्वयं सुरक्षित रखते थे और एक-दूसरे के साथ बीजों का आदान-प्रदान भी करते थे। आज यह परंपरा कमजोर होती जा रही है, जिसके कारण कई स्थानीय किस्मों के अस्तित्व पर खतरा मंडरा रहा है।
उन्होंने लोगों से निवेदन किया कि यदि किसी किसान या परिवार के पास पुरानी देशी मक्की, रागी, कुल्थ, चौलाई, कुट्टू, फाफरा, दालों अथवा अन्य पारंपरिक फसलों के बीज उपलब्ध हैं, तो उन्हें नष्ट न करें और आने वाली पीढ़ियों के लिए सुरक्षित रखें।
धीरज रमौल ने कहा कि विशेष रूप से सिरमौर जिले के ग्रामीण क्षेत्रों में अभी भी कई परिवारों के पास पारंपरिक बीजों और खेती से जुड़ा पुराना ज्ञान मौजूद है। बुजुर्ग किसानों के पास बीजों को सुरक्षित रखने, बुवाई करने और स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार फसल उगाने का जो अनुभव है, उसे भी दर्ज किया जाना चाहिए।
उन्होंने कहा कि हर गांव में स्थानीय स्तर पर 'देशी बीज बैंक' बनाने की पहल की जा सकती है। इसमें किसानों द्वारा उपलब्ध करवाए गए पारंपरिक बीजों को सुरक्षित रखा जाए और उनका संरक्षण एवं समय-समय पर पुनः उत्पादन किया जाए। इससे स्थानीय बीजों की अगली पीढ़ी तक निरंतर उपलब्धता सुनिश्चित की जा सकती है।
उन्होंने किसानों से यह भी अपील की कि पारंपरिक फसलों को केवल इसलिए न छोड़ें क्योंकि उनका बाजार सीमित है। यदि ग्रामीण समुदाय मिलकर इन फसलों का उत्पादन, प्रसंस्करण और स्थानीय स्तर पर बिक्री शुरू करे तो इससे किसानों की आय बढ़ाने के साथ-साथ स्थानीय खाद्य संस्कृति को भी मजबूत किया जा सकता है।
धीरज रमौल ने कहा कि जलवायु परिवर्तन, अनियमित वर्षा और पानी की बढ़ती कमी के दौर में स्थानीय परिस्थितियों के अनुकूल पारंपरिक फसलों का महत्व और अधिक बढ़ गया है। इसलिए देशी बीजों का संरक्षण भविष्य की कृषि और खाद्य सुरक्षा के लिए भी आवश्यक है।
उन्होंने युवाओं, महिला मंडलों, स्वयं सहायता समूहों, पंचायत प्रतिनिधियों और स्कूलों से भी इस अभियान से जुड़ने की अपील की। उन्होंने कहा कि बच्चों और युवाओं को अपनी पारंपरिक फसलों और स्थानीय कृषि विरासत से जोड़ना समय की जरूरत है।
धीरज रमौल ने लोगों से भावनात्मक अपील करते हुए कहा, “अपने घर में रखे पुराने देशी बीजों को संभालकर रखें। हो सकता है कि आज हमें उनका महत्व कम दिखाई दे, लेकिन आने वाली पीढ़ियों के लिए यही बीज हमारी सबसे बड़ी कृषि विरासत बन सकते हैं। एक किसान एक देशी बीज बचाए और उसे आगे बढ़ाए, तो हम मिलकर अपनी पारंपरिक कृषि को फिर से मजबूत कर सकते हैं।”
उन्होंने कहा कि प्रयास सोसाइटी देशी बीजों और पारंपरिक फसलों के संरक्षण के लिए लोगों में जागरूकता पैदा करने तथा सामुदायिक स्तर पर इस दिशा में प्रयास करने के लिए प्रतिबद्ध है।

दिल्ली में राष्ट्रीय परामर्श कार्यशाला में हिमाचल की प्रयास सोसाइटी ने लिया भाग

धीरज रमौल ने कहा - नागरिक समाज की भूमिका उपस्थिति से आगे बढ़कर सहभागिता और साझेदारी तक पहुंचे नई दिल्ली, 3 नवंबर। नागरिक समाज संगठनों के लिए...