Maandag 21 September 2026

कम बारिश से प्राकृतिक जलस्रोतों पर बढ़ा दबाव, संरक्षण को जनअभियान बनाना जरूरी: धीरज रमौल

चश्मों, बावड़ियों और पारंपरिक जलस्रोतों के संरक्षण के साथ कैचमेंट एरिया पर भी देना होगा ध्यान

सिरमौर, 20 सितंबर। इस वर्ष बारिश अपेक्षाकृत कम होने के कारण पहाड़ी क्षेत्रों के प्राकृतिक जलस्रोतों में पानी का स्तर अपेक्षा के अनुरूप नहीं बढ़ पाया है। कई क्षेत्रों में प्राकृतिक चश्मों और पारंपरिक जलस्रोतों में पानी की उपलब्धता प्रभावित हुई है। ऐसे में भविष्य में जल संकट की स्थिति से बचने के लिए प्राकृतिक जलस्रोतों के संरक्षण और संवर्धन को प्राथमिकता देना जरूरी हो गया है।
प्रयास सोसाइटी के सचिव धीरज रमौल ने कहा कि पहाड़ी क्षेत्रों में प्राकृतिक चश्मे, बावड़ियां और अन्य पारंपरिक जलस्रोत सदियों से ग्रामीण जीवन का महत्वपूर्ण आधार रहे हैं। इन जलस्रोतों से पेयजल सहित ग्रामीणों की कई आवश्यकताएं पूरी होती रही हैं। बदलते मौसम, कम बारिश, जलस्रोतों के आसपास हो रहे बदलाव और उनके कैचमेंट क्षेत्रों के प्रभावित होने के कारण इन प्राकृतिक स्रोतों के संरक्षण की आवश्यकता पहले से अधिक बढ़ गई है।
उन्होंने कहा कि इस वर्ष बारिश कम होने के कारण जिन प्राकृतिक जलस्रोतों में सामान्य परिस्थितियों में पानी का स्तर बढ़ना चाहिए था, वहां अपेक्षित बढ़ोतरी नहीं हो पाई। यह स्थिति आने वाले समय के लिए एक महत्वपूर्ण संकेत है। केवल बारिश पर निर्भर रहने के बजाय वर्षा जल को रोकने, जमीन में पानी का रिचार्ज बढ़ाने और प्राकृतिक जलस्रोतों के कैचमेंट क्षेत्रों को सुरक्षित रखने की दिशा में लगातार प्रयास करने होंगे।

जलस्रोतों की पहचान और मैपिंग की जरूरत

धीरज रमौल ने कहा कि प्रत्येक गांव में मौजूद प्राकृतिक चश्मों, बावड़ियों और पुराने जलस्रोतों की पहचान कर उनका रिकॉर्ड तैयार किया जाना चाहिए। इनमें से कौन-सा जलस्रोत सक्रिय है, कौन-सा कमजोर हो रहा है और कौन-सा सूखने की स्थिति में है, इसकी जानकारी पंचायत स्तर पर उपलब्ध होनी चाहिए। इससे जरूरत के अनुसार संरक्षण की प्राथमिकता तय करने में मदद मिलेगी।
उन्होंने कहा कि जलस्रोतों के संरक्षण के साथ उनके कैचमेंट एरिया पर भी विशेष ध्यान देना जरूरी है। जलस्रोत के आसपास पौधरोपण, मिट्टी एवं नमी संरक्षण, छोटे जल-संचयन ढांचे तथा वर्षा जल को जमीन में उतारने के प्रयास किए जाएं तो प्राकृतिक जलस्रोतों के रिचार्ज में मदद मिल सकती है।
स्थानीय लोगों और युवाओं की भागीदारी जरूरी
प्रयास सोसाइटी के सचिव ने कहा कि जल संरक्षण केवल सरकार या किसी एक विभाग की जिम्मेदारी नहीं है। पंचायतों, महिला मंडलों, युवक मंडलों, स्कूलों, स्वयंसेवी संस्थाओं और स्थानीय ग्रामीणों की सामूहिक भागीदारी से ही जलस्रोतों को लंबे समय तक सुरक्षित रखा जा सकता है।
उन्होंने युवाओं से भी आह्वान किया कि वे अपने गांव के प्राकृतिक जलस्रोतों की जानकारी एकत्र करने, उनकी स्वच्छता बनाए रखने, पौधरोपण और जल संरक्षण गतिविधियों में सक्रिय भूमिका निभाएं। स्कूलों में बच्चों को स्थानीय जलस्रोतों के महत्व से जोड़कर ‘जल प्रहरी’ जैसी जागरूकता गतिविधियां भी शुरू की जा सकती हैं।

पुरानी जल परंपराओं को भी संरक्षित करने की जरूरत

धीरज रमौल ने कहा कि ग्रामीण क्षेत्रों में कई ऐसे पुराने चश्मे और बावड़ियां हैं, जिनका इतिहास और उपयोग स्थानीय बुजुर्गों को पता है। इनकी जानकारी को भी दस्तावेज के रूप में सुरक्षित किया जाना चाहिए, ताकि आने वाली पीढ़ियां अपने पारंपरिक जलस्रोतों और उनसे जुड़ी जल संरक्षण की स्थानीय परंपराओं को समझ सकें।
उन्होंने कहा कि “जल स्रोत बचेंगे तो गांव बचेगा” केवल एक नारा नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के सुरक्षित भविष्य से जुड़ी जिम्मेदारी है। यदि आज प्राकृतिक जलस्रोतों के संरक्षण, वर्षा जल संचयन और जल रिचार्ज की दिशा में सामूहिक प्रयास किए जाते हैं, तो भविष्य में ग्रामीण क्षेत्रों में जल संकट के प्रभाव को कम करने में मदद मिल सकती है।
धीरज रमौल ने कहा कि प्रयास सोसाइटी स्थानीय लोगों, युवाओं और संबंधित संस्थाओं के सहयोग से प्राकृतिक जलस्रोतों के संरक्षण को लेकर जनजागरूकता को आगे बढ़ाने के लिए प्रयासरत रहेगी। उन्होंने ग्रामीणों से अपने-अपने क्षेत्र के चश्मों, बावड़ियों और अन्य पारंपरिक जलस्रोतों की पहचान कर उनके संरक्षण के लिए सामूहिक पहल करने का आह्वान किया।
यह रिपोर्ट आगे चलकर प्रयास सोसाइटी के “जल स्रोत बचाओ अभियान” की पहली कड़ी के रूप में भी इस्तेमाल की जा सकती है - बाद में सर्वेक्षण, जलस्रोत सफाई, पौधरोपण या रिचार्ज कार्य हों तो उन्हें इसी अभियान से जोड़ा जा सकेगा।


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