Dinsdag 28 Julie 2026

प्राकृतिक खेती एवं लघु अनाजों को बढ़ावा देना समय की आवश्यकता : धीरज रमौल सिरमौर । प्रयास सोसाइटी द्वारा हिम आरआरए नेटवर्क के सहयोग से जिला सिरमौर की ग्राम पंचायत भरोग बनेड़ी के ग्राम भरोग बनेड़ी में प्राकृतिक खेती, देशी बीजों के संरक्षण तथा लघु अनाजों (मिलेट्स) को बढ़ावा देने के उद्देश्य से व्यापक डोर-टू-डोर कृषि सर्वेक्षण एवं जनजागरूकता अभियान चलाया गया। इस अभियान के दौरान सोसाइटी के कार्यकर्ताओं ने घर-घर जाकर किसानों से संवाद स्थापित किया तथा प्राकृतिक खेती, आत्मनिर्भर कृषि व्यवस्था और पारंपरिक बीज संरक्षण के महत्व पर विस्तार से चर्चा की।सर्वेक्षण के दौरान किसानों से खरीफ, रबी एवं जायद मौसम में उगाई जाने वाली फसलों, प्राकृतिक खेती अपनाने की स्थिति, उपलब्ध कृषि भूमि, देशी बीजों की उपलब्धता, सिंचाई के स्रोत तथा स्थानीय बीज संरक्षण की परंपराओं से संबंधित जानकारी एकत्रित की गई। सर्वेक्षण में यह पाया गया कि क्षेत्र के किसान आज भी अनेक पारंपरिक एवं स्थानीय फसलों का संरक्षण कर रहे हैं तथा स्वयं तैयार किए गए बीजों का उपयोग करते हैं। साथ ही अधिकांश किसान प्राकृतिक खेती की ओर बढ़ रहे हैं और पारंपरिक कृषि ज्ञान को संरक्षित करने में रुचि दिखा रहे हैं।सर्वेक्षण में किसानों द्वारा उगाई जाने वाली प्रमुख खरीफ फसलों में मक्का, धान, सोयाबीन, उड़द, मूंग, लोबिया, तिल, अदरक, हल्दी, अरबी, खीरा, लौकी, तुरई, कद्दू, टमाटर, मिर्च, बैंगन, भिंडी तथा चलाई शामिल हैं। वहीं रबी फसलों में गेहूँ, जौ, राजमा, मसूर, चना, काला चना, सरसों, राई, धनिया, मेथी, लहसुन, प्याज, मटर तथा कुल्थी जैसी फसलें प्रमुख रूप से उगाई जाती हैं। इसके अतिरिक्त कई किसानों द्वारा कश्मीरी लहसुन, बड़ी इलायची, कलजीरी, अलसी, मंडुवा (रागी), भट्ट, फरासबीन तथा अन्य स्थानीय किस्मों का भी संरक्षण किया जा रहा है।सर्वेक्षण में यह भी सामने आया कि अधिकांश किसान स्वयं संरक्षित बीज (Own Saved Seed), स्थानीय किसानों के बीच बीज आदान-प्रदान (Local Farmer Exchange) तथा सामुदायिक बीज साझाकरण प्रणाली (Community Seed Sharing System) के माध्यम से देशी बीजों का संरक्षण कर रहे हैं। यह परंपरा क्षेत्र की कृषि जैव विविधता को सुरक्षित रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है और भविष्य में सीड विलेज (Seed Village) की अवधारणा को मजबूत करने में भी सहायक होगी।प्रयास सोसाइटी के सचिव धीरज रमौल ने कहा कि प्राकृतिक खेती, देशी बीजों का संरक्षण और लघु अनाजों को बढ़ावा देना वर्तमान समय की सबसे बड़ी आवश्यकता है। उन्होंने कहा कि रासायनिक खेती पर बढ़ती निर्भरता के कारण भूमि की उर्वरता प्रभावित हो रही है, जबकि प्राकृतिक खेती कम लागत, बेहतर मिट्टी स्वास्थ्य और सुरक्षित खाद्य उत्पादन का प्रभावी विकल्प है।उन्होंने कहा कि मिलेट्स (लघु अनाज) जैसे मंडुवा, जौ, कुल्थी, भट्ट तथा अन्य पारंपरिक फसलें न केवल पोषण सुरक्षा प्रदान करती हैं, बल्कि जलवायु परिवर्तन की चुनौतियों का सामना करने में भी सक्षम हैं। ऐसे अनाज कम पानी में बेहतर उत्पादन देते हैं तथा पर्वतीय क्षेत्रों के लिए अत्यंत उपयुक्त हैं।धीरज रमौल ने किसानों से अधिक से अधिक देशी एवं स्थानीय बीजों का उपयोग करने, अपने स्तर पर गुणवत्तापूर्ण बीज तैयार करने तथा बीज संरक्षण की पारंपरिक व्यवस्था को आगे बढ़ाने का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि यदि किसान स्वयं बीज तैयार करेंगे तो खेती की लागत कम होगी, बाहरी बीजों पर निर्भरता घटेगी और स्थानीय कृषि जैव विविधता सुरक्षित रहेगी।उन्होंने बताया कि प्रयास सोसाइटी द्वारा किए गए इस सर्वेक्षण के आधार पर हिम आरआरए नेटवर्क (HIM RRA Network) के सहयोग से प्राकृतिक खेती, सीड विलेज विकास, स्थानीय बीज बैंक की स्थापना, किसानों के क्षमता विकास, जल संरक्षण तथा जलवायु अनुकूल कृषि को बढ़ावा देने की दिशा में आगामी समय में भी संयुक्त रूप से कार्य किया जाएगा। इसके लिए विभिन्न प्रशिक्षण कार्यक्रम, किसान संवाद, बीज संरक्षण अभियान तथा जागरूकता गतिविधियाँ आयोजित की जाएंगी, ताकि ग्रामीण समुदाय आत्मनिर्भर एवं टिकाऊ कृषि प्रणाली को अपनाने के लिए प्रेरित हो सके।अभियान के अंत में किसानों एवं ग्रामीणों ने प्राकृतिक खेती अपनाने, देशी बीजों के संरक्षण, लघु अनाजों के उत्पादन में वृद्धि तथा आत्मनिर्भर कृषि व्यवस्था को मजबूत बनाने के लिए सामूहिक रूप से कार्य करने का संकल्प लिया। प्रयास सोसाइटी एवं हिम आरआरए नेटवर्क ने कहा कि भविष्य में भी इस प्रकार के सर्वेक्षण, प्रशिक्षण एवं जनजागरूकता कार्यक्रम लगातार आयोजित किए जाएंगे, ताकि सिरमौर जिले के ग्रामीण क्षेत्रों में टिकाऊ, पर्यावरण अनुकूल तथा जलवायु-सहिष्णु कृषि को बढ़ावा मिल सके।

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