Dinsdag 29 September 2026

बारिश के बदलते स्वरूप के बीच जल संरक्षण पर गंभीरता से काम करने की जरूरत : प्रयास सोसाइटी


प्राकृतिक जलस्रोतों के संरक्षण के साथ वर्षा जल संचयन को बढ़ावा देने की आवश्यकता

सिरमौर 29 सितंबर। बारिश के बदलते स्वरूप और जलवायु परिवर्तन के बीच आने वाले समय के लिए जल सुरक्षा सुनिश्चित करने को लेकर प्रयास सोसाइटी ने जल संरक्षण के कार्यों को और मजबूत करने की आवश्यकता जताई है। संस्था का कहना है कि वर्षा जल का अधिक से अधिक संरक्षण, प्राकृतिक जलस्रोतों का पुनर्भरण और ग्रामीण स्तर पर सामुदायिक भागीदारी आज समय की महत्वपूर्ण जरूरत बन गई है।
प्रयास सोसाइटी के सचिव धीरज रमौल ने कहा कि हिमाचल प्रदेश में अनेक गांवों की पेयजल व्यवस्था प्राकृतिक जलस्रोतों पर निर्भर है। ऐसे में बारिश के पानी को सीधे बह जाने देने के बजाय उसे जमीन में उतारने और प्राकृतिक जलस्रोतों के रिचार्ज के लिए योजनाबद्ध तरीके से कार्य किया जाना चाहिए।
उन्होंने कहा कि जल संरक्षण केवल सरकारी विभागों की जिम्मेदारी नहीं है, बल्कि इसमें पंचायतों, महिला मंडलों, युवक मंडलों, स्वयं सहायता समूहों, किसानों और आम नागरिकों की सक्रिय भागीदारी जरूरी है। गांव स्तर पर छोटे-छोटे जल संरक्षण कार्य जैसे रिचार्ज पिट, कंटूर ट्रेंच, चेक डैम, वर्षा जल संचयन और जलस्रोतों के आसपास पौधरोपण लंबे समय में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।
धीरज रमौल ने कहा कि संस्था पिछले कई वर्षों से ग्रामीण क्षेत्रों में प्राकृतिक जलस्रोतों, वर्षा जल संरक्षण और पर्यावरण संरक्षण को लेकर जनजागरूकता एवं सामुदायिक भागीदारी के माध्यम से कार्य कर रही है। बदलती परिस्थितियों को देखते हुए अब इन प्रयासों को और व्यापक बनाने की आवश्यकता है।
उन्होंने ग्रामीणों से अपील की कि अपने आसपास मौजूद बावड़ियों, धारों, नालों, नौलों और अन्य पारंपरिक जलस्रोतों को सुरक्षित रखें तथा जलस्रोतों के आसपास कूड़ा-कचरा न डालें। साथ ही बारिश के पानी को संरक्षित करने के लिए घरों और खेतों के स्तर पर भी छोटे-छोटे उपाय अपनाए जाएं।
प्रयास सोसाइटी के अनुसार जल संरक्षण का सबसे प्रभावी तरीका स्थानीय परिस्थितियों और समुदाय की जरूरतों को ध्यान में रखते हुए सामूहिक प्रयास करना है। यदि वर्षा जल का संरक्षण और प्राकृतिक जलस्रोतों का पुनर्भरण नियमित रूप से किया जाए तो ग्रामीण क्षेत्रों में भविष्य की जल चुनौतियों को काफी हद तक कम किया जा सकता है।

Maandag 28 September 2026

PARAYAS Society Volunteer Ranjit Singh Plants Saplings in Salasar, Rajasthan on Shaheed Bhagat Singh’s Birth Anniversary


“Shaheed Bhagat Singh Continues to Inspire the Youth” : Ranjit Singh

Salasar, Rajasthan, September 28 : On the occasion of the 119th birth anniversary of Shaheed-e-Azam Sardar Bhagat Singh, PARAYAS Society, Himachal Pradesh volunteer and social worker Ranjit Singh planted saplings at Salasar, Rajasthan, paying tribute to the great revolutionary and freedom fighter.
Ranjit Singh dedicated the plantation activity to the sacrifice and contribution of Shaheed Bhagat Singh towards the nation and appealed to people to plant more trees and actively participate in environmental conservation.
He said that Shaheed Bhagat Singh was not only one of the great revolutionaries of India's freedom struggle but also a lasting source of inspiration for the youth. His courage, sacrifice, patriotism and commitment to the nation continue to motivate young people to work for a better society and a better future.
Ranjit Singh said that Bhagat Singh was born on September 28, 1907, in Banga village of Lyallpur, in present-day Pakistan. The revolutionary environment around him and the prevailing conditions in the country had a deep impact on his personality from an early age. The Jallianwala Bagh massacre further strengthened his determination to fight against British rule.
He said Bhagat Singh played an important role in the Naujawan Bharat Sabha and was associated with the Hindustan Socialist Republican Association (HSRA). Along with being a fearless revolutionary, he was also a writer, thinker and progressive intellectual. His famous slogan “Inquilab Zindabad” continues to inspire generations.
Ranjit Singh said Bhagat Singh sacrificed his life for the freedom of the country and was martyred on March 23, 1931, along with Rajguru and Sukhdev.
He said that planting a sapling on the birth anniversary of Shaheed Bhagat Singh is not merely an environmental activity but also a commitment towards future generations. Just as the freedom fighters sacrificed their present for the future of the nation, today's generation must take responsibility for protecting nature and natural resources.
He appealed to people to plant trees and ensure their proper care and survival. He said trees are essential for clean air, water conservation, biodiversity and a healthy environment.
On the occasion, Ranjit Singh gave the message:
🌳 Plant more trees.
🌿 Protect the environment, protect the Earth.
🌱 Increase greenery, secure the future.
Salute to Shaheed-e-Azam Bhagat Singh.
Inquilab Zindabad. 🇮🇳🌹

PARAYAS Society, Himachal Pradesh

Vrydag 25 September 2026

स्वच्छ सागर, सुरक्षित सागर के लिए हर नागरिक निभाए अपनी जिम्मेदारी : धीरज रमौल

सिरमौर 25 सितंबर। ‘स्वच्छ सागर, सुरक्षित सागर’ (SSSS 5.0) अभियान के तहत राजकीय वरिष्ठ माध्यमिक विद्यालय भरोग-बनेड़ी में आयोजित पर्यावरण संरक्षण प्रतिज्ञा कार्यक्रम के बाद प्रयास सोसाइटी के सचिव धीरज रमौल ने देशवासियों एवं प्रदेशवासियों से समुद्र, नदियों, झरनों और सभी जल स्रोतों को स्वच्छ एवं सुरक्षित रखने में अपनी जिम्मेदारी निभाने का आह्वान किया।
धीरज रमौल ने कहा कि समुद्र केवल तटीय क्षेत्रों में रहने वाले लोगों के लिए ही महत्वपूर्ण नहीं हैं, बल्कि देश के प्रत्येक नागरिक के जीवन और पर्यावरण से उनका सीधा संबंध है। समुद्र पृथ्वी के पर्यावरणीय संतुलन, जैव विविधता, जलवायु और आने वाली पीढ़ियों के भविष्य में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
उन्होंने कहा कि समुद्रों को स्वच्छ रखने की शुरुआत हमारे घर, गांव और स्थानीय जल स्रोतों से होती है। यदि नदियों, नालों, खड्डों, झरनों और अन्य जल स्रोतों में कचरा एवं प्लास्टिक जाने से रोका जाए तो इसका सकारात्मक प्रभाव व्यापक स्तर पर पर्यावरण संरक्षण में दिखाई देगा।
उन्होंने कहा कि प्लास्टिक प्रदूषण आज जल स्रोतों और पर्यावरण के लिए बड़ी चुनौती है। प्रत्येक नागरिक को एकल-उपयोग प्लास्टिक का कम से कम इस्तेमाल करने, कचरे का उचित निपटान करने और अपने आसपास के जल स्रोतों को प्रदूषण से बचाने की जिम्मेदारी निभानी चाहिए।
धीरज रमौल ने कहा कि विद्यालयों में विद्यार्थियों के माध्यम से पर्यावरण संरक्षण की जागरूकता को घर-घर तक पहुंचाया जा सकता है। बच्चे और युवा भविष्य के जिम्मेदार नागरिक हैं और उनमें पर्यावरण के प्रति संवेदनशीलता विकसित करना समाज की सामूहिक जिम्मेदारी है।
उन्होंने देश एवं प्रदेशवासियों से अपील करते हुए कहा कि “स्वच्छ सागर, सुरक्षित सागर का संदेश केवल समुद्र तक सीमित नहीं रहना चाहिए। यह संदेश हिमाचल के पहाड़ी गांवों के छोटे जलस्रोतों से लेकर देश की नदियों और समुद्रों तक पहुंचना चाहिए। जल की प्रत्येक धारा को स्वच्छ और सुरक्षित रखना हम सभी की साझा जिम्मेदारी है।”
उन्होंने कहा कि प्रयास सोसाइटी आगे भी विद्यार्थियों, शिक्षकों, समुदाय और आम नागरिकों की भागीदारी से जल संरक्षण, प्लास्टिक प्रदूषण में कमी, पर्यावरण संरक्षण और जन-जागरूकता से जुड़ी गतिविधियों को बढ़ावा देती रहेगी।
धीरज रमौल ने सभी नागरिकों से आह्वान किया कि वे केवल पर्यावरण संरक्षण की प्रतिज्ञा न लें, बल्कि उसे अपने दैनिक व्यवहार का हिस्सा बनाएं। यही आने वाली पीढ़ियों के लिए स्वच्छ, सुरक्षित और स्वस्थ पर्यावरण की मजबूत नींव होगी।

Woensdag 23 September 2026

‘स्वच्छ सागर, सुरक्षित सागर’ अभियान के तहत प्रयास सोसाइटी ने भरोग-बनेड़ी विद्यालय में दिलाई पर्यावरण संरक्षण की प्रतिज्ञा

सिरमौर/भरोग-बनेड़ी, 23 सितंबर। पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय, भारत सरकार के सौजन्य से चलाए जा रहे ‘स्वच्छ सागर, सुरक्षित सागर’ (SSSS 5.0) अभियान के अंतर्गत बुधवार को श्री शिवानंद रमौल स्मारक राजकीय वरिष्ठ माध्यमिक विद्यालय भरोग-बनेड़ी में प्रतिज्ञा कार्यक्रम आयोजित किया गया। कार्यक्रम का आयोजन प्रयास सोसाइटी द्वारा किया गया।
विद्यालय की प्रधानाचार्या अंजना कुमारी जी के मार्गदर्शन में आयोजित इस कार्यक्रम में 143 विद्यार्थियों तथा 14 स्टाफ सदस्यों ने भाग लिया। इस दौरान विद्यार्थियों एवं स्टाफ ने समुद्रों, तटों तथा जल निकायों को स्वच्छ एवं सुरक्षित रखने, जल स्रोतों में कचरा न डालने, एकल-उपयोग प्लास्टिक के इस्तेमाल से बचने तथा कचरे का उचित निपटान करने की प्रतिज्ञा ली।
‘स्वच्छ सागर, सुरक्षित सागर’ (SSSS 5.0) अभियान का मुख्य उद्देश्य समुद्री संरक्षण एवं पर्यावरण जागरूकता को बढ़ावा देना है। अभियान के माध्यम से विद्यार्थियों, शिक्षकों, विशेषज्ञों, कर्मचारियों तथा आम जनता सहित समाज के विभिन्न वर्गों की जनभागीदारी सुनिश्चित करते हुए समुद्री स्वच्छता के लिए सामूहिक प्रयासों को बढ़ावा दिया जा रहा है। साथ ही प्लास्टिक एवं अन्य कचरे से समुद्र और समुद्री तटों को होने वाले नुकसान को कम करने तथा ऑनलाइन प्रतिज्ञा एवं विभिन्न जागरूकता गतिविधियों के माध्यम से लोगों को पर्यावरण के प्रति उनके दायित्वों के प्रति जागरूक करना इसका महत्वपूर्ण उद्देश्य है।
कार्यक्रम के दौरान विद्यार्थियों को समुद्री एवं जलीय पर्यावरण के संरक्षण के महत्व के बारे में जागरूक किया गया। वक्ताओं ने कहा कि समुद्र और जल निकाय केवल पर्यावरण के लिए ही महत्वपूर्ण नहीं हैं, बल्कि मानव जीवन, जैव विविधता और आने वाली पीढ़ियों के भविष्य से भी सीधे जुड़े हैं। उन्होंने कहा कि समुद्री पर्यावरण की सुरक्षा के लिए केवल तटीय क्षेत्रों में ही नहीं, बल्कि देश के प्रत्येक गांव और विद्यालय में भी स्वच्छता एवं पर्यावरण संरक्षण के प्रति जागरूकता आवश्यक है।
इस अवसर पर उपस्थित स्टाफ सदस्यों में श्री अजय प्रकाश, श्री भूपेश कुमार, श्री महेंद्र सिंह, श्री विक्रम सिंह, श्री राजेश कुमार, श्री कपिल देव, श्री तिवारी शर्मा, श्री अजय कुमार, श्री संदीप कुमार, श्री तपेंद्र सिंह, श्रीमती विनिता देवी, आस्था शर्मा तथा समृति ठाकुर शामिल रहे।
प्रयास सोसाइटी की ओर से कहा गया कि ‘स्वच्छ सागर, सुरक्षित सागर’ का संदेश केवल समुद्री क्षेत्रों तक सीमित नहीं है। जल संरक्षण, स्वच्छता, प्लास्टिक प्रदूषण में कमी और पर्यावरणीय जिम्मेदारी का संदेश देश के प्रत्येक गांव और विद्यालय तक पहुंचाना आवश्यक है। इसी उद्देश्य से प्रयास सोसाइटी द्वारा विद्यार्थियों एवं समुदाय को पर्यावरण संरक्षण के प्रति जागरूक करने के लिए विभिन्न गतिविधियों में सहभागिता की जा रही है।
कार्यक्रम के अंत में सभी प्रतिभागियों ने स्वच्छ, सुरक्षित एवं सतत पर्यावरण के निर्माण में अपना योगदान देने का संकल्प लिया।




Maandag 21 September 2026

कम बारिश से प्राकृतिक जलस्रोतों पर बढ़ा दबाव, संरक्षण को जनअभियान बनाना जरूरी: धीरज रमौल

चश्मों, बावड़ियों और पारंपरिक जलस्रोतों के संरक्षण के साथ कैचमेंट एरिया पर भी देना होगा ध्यान

सिरमौर, 20 सितंबर। इस वर्ष बारिश अपेक्षाकृत कम होने के कारण पहाड़ी क्षेत्रों के प्राकृतिक जलस्रोतों में पानी का स्तर अपेक्षा के अनुरूप नहीं बढ़ पाया है। कई क्षेत्रों में प्राकृतिक चश्मों और पारंपरिक जलस्रोतों में पानी की उपलब्धता प्रभावित हुई है। ऐसे में भविष्य में जल संकट की स्थिति से बचने के लिए प्राकृतिक जलस्रोतों के संरक्षण और संवर्धन को प्राथमिकता देना जरूरी हो गया है।
प्रयास सोसाइटी के सचिव धीरज रमौल ने कहा कि पहाड़ी क्षेत्रों में प्राकृतिक चश्मे, बावड़ियां और अन्य पारंपरिक जलस्रोत सदियों से ग्रामीण जीवन का महत्वपूर्ण आधार रहे हैं। इन जलस्रोतों से पेयजल सहित ग्रामीणों की कई आवश्यकताएं पूरी होती रही हैं। बदलते मौसम, कम बारिश, जलस्रोतों के आसपास हो रहे बदलाव और उनके कैचमेंट क्षेत्रों के प्रभावित होने के कारण इन प्राकृतिक स्रोतों के संरक्षण की आवश्यकता पहले से अधिक बढ़ गई है।
उन्होंने कहा कि इस वर्ष बारिश कम होने के कारण जिन प्राकृतिक जलस्रोतों में सामान्य परिस्थितियों में पानी का स्तर बढ़ना चाहिए था, वहां अपेक्षित बढ़ोतरी नहीं हो पाई। यह स्थिति आने वाले समय के लिए एक महत्वपूर्ण संकेत है। केवल बारिश पर निर्भर रहने के बजाय वर्षा जल को रोकने, जमीन में पानी का रिचार्ज बढ़ाने और प्राकृतिक जलस्रोतों के कैचमेंट क्षेत्रों को सुरक्षित रखने की दिशा में लगातार प्रयास करने होंगे।

जलस्रोतों की पहचान और मैपिंग की जरूरत

धीरज रमौल ने कहा कि प्रत्येक गांव में मौजूद प्राकृतिक चश्मों, बावड़ियों और पुराने जलस्रोतों की पहचान कर उनका रिकॉर्ड तैयार किया जाना चाहिए। इनमें से कौन-सा जलस्रोत सक्रिय है, कौन-सा कमजोर हो रहा है और कौन-सा सूखने की स्थिति में है, इसकी जानकारी पंचायत स्तर पर उपलब्ध होनी चाहिए। इससे जरूरत के अनुसार संरक्षण की प्राथमिकता तय करने में मदद मिलेगी।
उन्होंने कहा कि जलस्रोतों के संरक्षण के साथ उनके कैचमेंट एरिया पर भी विशेष ध्यान देना जरूरी है। जलस्रोत के आसपास पौधरोपण, मिट्टी एवं नमी संरक्षण, छोटे जल-संचयन ढांचे तथा वर्षा जल को जमीन में उतारने के प्रयास किए जाएं तो प्राकृतिक जलस्रोतों के रिचार्ज में मदद मिल सकती है।
स्थानीय लोगों और युवाओं की भागीदारी जरूरी
प्रयास सोसाइटी के सचिव ने कहा कि जल संरक्षण केवल सरकार या किसी एक विभाग की जिम्मेदारी नहीं है। पंचायतों, महिला मंडलों, युवक मंडलों, स्कूलों, स्वयंसेवी संस्थाओं और स्थानीय ग्रामीणों की सामूहिक भागीदारी से ही जलस्रोतों को लंबे समय तक सुरक्षित रखा जा सकता है।
उन्होंने युवाओं से भी आह्वान किया कि वे अपने गांव के प्राकृतिक जलस्रोतों की जानकारी एकत्र करने, उनकी स्वच्छता बनाए रखने, पौधरोपण और जल संरक्षण गतिविधियों में सक्रिय भूमिका निभाएं। स्कूलों में बच्चों को स्थानीय जलस्रोतों के महत्व से जोड़कर ‘जल प्रहरी’ जैसी जागरूकता गतिविधियां भी शुरू की जा सकती हैं।

पुरानी जल परंपराओं को भी संरक्षित करने की जरूरत

धीरज रमौल ने कहा कि ग्रामीण क्षेत्रों में कई ऐसे पुराने चश्मे और बावड़ियां हैं, जिनका इतिहास और उपयोग स्थानीय बुजुर्गों को पता है। इनकी जानकारी को भी दस्तावेज के रूप में सुरक्षित किया जाना चाहिए, ताकि आने वाली पीढ़ियां अपने पारंपरिक जलस्रोतों और उनसे जुड़ी जल संरक्षण की स्थानीय परंपराओं को समझ सकें।
उन्होंने कहा कि “जल स्रोत बचेंगे तो गांव बचेगा” केवल एक नारा नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के सुरक्षित भविष्य से जुड़ी जिम्मेदारी है। यदि आज प्राकृतिक जलस्रोतों के संरक्षण, वर्षा जल संचयन और जल रिचार्ज की दिशा में सामूहिक प्रयास किए जाते हैं, तो भविष्य में ग्रामीण क्षेत्रों में जल संकट के प्रभाव को कम करने में मदद मिल सकती है।
धीरज रमौल ने कहा कि प्रयास सोसाइटी स्थानीय लोगों, युवाओं और संबंधित संस्थाओं के सहयोग से प्राकृतिक जलस्रोतों के संरक्षण को लेकर जनजागरूकता को आगे बढ़ाने के लिए प्रयासरत रहेगी। उन्होंने ग्रामीणों से अपने-अपने क्षेत्र के चश्मों, बावड़ियों और अन्य पारंपरिक जलस्रोतों की पहचान कर उनके संरक्षण के लिए सामूहिक पहल करने का आह्वान किया।
यह रिपोर्ट आगे चलकर प्रयास सोसाइटी के “जल स्रोत बचाओ अभियान” की पहली कड़ी के रूप में भी इस्तेमाल की जा सकती है - बाद में सर्वेक्षण, जलस्रोत सफाई, पौधरोपण या रिचार्ज कार्य हों तो उन्हें इसी अभियान से जोड़ा जा सकेगा।


Vrydag 11 September 2026

विज्ञान के साथ संस्कार और प्रकृति का सम्मान ही बनाएगा हिमाचल का उज्ज्वल भविष्य : धीरज रमौल


विज्ञान के साथ संस्कार और प्रकृति का सम्मान ही बनाएगा हिमाचल का उज्ज्वल भविष्य : धीरज रमौल

आधुनिक तकनीक अपनाएं, लेकिन अपनी जड़ों से रिश्ता न टूटने दें।
हिमाचल का भविष्य केवल बड़ी परियोजनाओं और आधुनिक विकास में नहीं, बल्कि स्वच्छ जल, सुरक्षित जंगल, उपजाऊ जमीन, मजबूत किसान, सशक्त महिलाएं, शिक्षित युवा और समृद्ध हिमाचली संस्कृति में भी है।
प्रयास सोसाइटी के सचिव धीरज रमौल ने कहा कि विज्ञान और तकनीक को प्रकृति के संरक्षण, प्राकृतिक खेती, स्थानीय एवं पारंपरिक बीजों के संरक्षण, जल स्रोतों के पुनर्जीवन और युवाओं के बेहतर भविष्य के लिए उपयोग किया जाना चाहिए।
उन्होंने कहा कि हमें ऐसा हिमाचल बनाना है, जहां विज्ञान की ऊंचाई के साथ संस्कारों की गहराई और विकास की गति के साथ प्रकृति का संतुलन बना रहे।
📰 विस्तृत समाचार अखबार की कटिंग में पढ़ें।
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Donderdag 10 September 2026

पहाड़ी क्षेत्रों के विकास, वर्षा आधारित कृषि और प्राकृतिक खेती को बढ़ावा देने की पहल; स्थानीय व पारंपरिक बीजों का जुटाया जा रहा विस्तृत आंकड़ा

भरोग बनेड़ी बनेगा बीज ग्राम, 151 किसानों तक पहुंचा प्रयास सोसाइटी का कृषि सर्वेक्षण

पहाड़ी क्षेत्रों के विकास, वर्षा आधारित कृषि और प्राकृतिक खेती को बढ़ावा देने की पहल; स्थानीय व पारंपरिक बीजों का जुटाया जा रहा विस्तृत आंकड़ा

सिरमौर, 09 सितंबर । भरोग बनेड़ी गांव को बीज ग्राम के रूप में विकसित करने की दिशा में प्रयास सोसाइटी द्वारा कृषि एवं पारंपरिक बीजों को लेकर आधारभूत सर्वेक्षण किया जा रहा है। पहाड़ी क्षेत्र विकास के लिए व्यावसायिक सहायता संस्था (पीएएचएडी ट्रस्ट) तथा हिमाचल पुनर्जीवित वर्षा आधारित कृषि नेटवर्क (हिमआरआरए) के सहयोग से चल रहे इस सर्वेक्षण के तहत अब तक 151 किसानों से संपर्क कर उनकी कृषि व्यवस्था, फसलों, स्थानीय किस्मों और पारंपरिक बीजों से संबंधित महत्वपूर्ण जानकारी जुटाई जा चुकी है।
सर्वेक्षण के प्रथम चरण में प्रयास सोसाइटी की टीम ने 101 किसानों से बातचीत कर उनकी कृषि व्यवस्था, फसलों, स्थानीय किस्मों और बीजों से संबंधित प्रारंभिक जानकारी एकत्रित की। इसके बाद दूसरे चरण में 50 किसानों से विस्तृत बातचीत कर निर्धारित सर्वेक्षण प्रपत्र भरने का कार्य किया गया। इस प्रकार दोनों चरणों में अब तक कुल 151 किसानों तक पहुंच बनाई जा चुकी है।
प्रयास सोसाइटी के सचिव धीरज रमौल ने बताया कि सर्वेक्षण का उद्देश्य केवल किसानों की संख्या दर्ज करना नहीं है, बल्कि भरोग बनेड़ी गांव में उपलब्ध स्थानीय एवं पारंपरिक बीजों, फसल विविधता तथा किसानों द्वारा वर्षों से अपनाई जा रही बीज संरक्षण की परंपरा को समझना और उसका व्यवस्थित दस्तावेजीकरण करना है।
उन्होंने बताया कि सर्वेक्षण के दौरान किसानों से उनकी भूमि का कुल क्षेत्रफल, सिंचित एवं वर्षा आधारित भूमि, बीज उत्पादन के लिए उपलब्ध भूमि तथा खेतों में उगाई जा रही विभिन्न फसलों और उनकी स्थानीय किस्मों के बारे में जानकारी ली जा रही है। इसके साथ ही प्रत्येक फसल का क्षेत्रफल, कितने वर्षों से उसकी खेती की जा रही है तथा किसानों के पास उपलब्ध बीज की अनुमानित मात्रा सहित विभिन्न कृषि संबंधी विवरण भी दर्ज किए जा रहे हैं।
सर्वेक्षण में यह भी जानकारी जुटाई जा रही है कि किसान अपने बीज स्वयं सुरक्षित रखते हैं अथवा बाजार से खरीदते हैं। साथ ही यह जानने का प्रयास किया जा रहा है कि कोई बीज कितने वर्षों से परिवार के पास सुरक्षित है और क्या कोई पारंपरिक बीज कई पीढ़ियों से परिवार में चला आ रहा है।
धीरज रमौल ने कहा कि स्थानीय बीजों की पहचान केवल उनकी उपलब्धता तक सीमित नहीं है। सर्वेक्षण के माध्यम से यह भी समझने का प्रयास किया जा रहा है कि विभिन्न पारंपरिक बीज सूखा, पाला, ओलावृष्टि, हिमपात और अत्यधिक वर्षा जैसी स्थानीय परिस्थितियों में किस प्रकार प्रदर्शन करते हैं। इससे भविष्य में किसानों के लिए अधिक उपयुक्त, टिकाऊ और स्थानीय परिस्थितियों के अनुकूल फसल किस्मों की पहचान करने में मदद मिलेगी।
उन्होंने कहा कि भरोग बनेड़ी जैसे पहाड़ी गांवों में किसानों के पास वर्षों से संरक्षित अनेक स्थानीय बीज और पारंपरिक कृषि ज्ञान मौजूद हैं। यदि इनका समय रहते दस्तावेजीकरण, संरक्षण और संवर्धन किया जाए तो यह क्षेत्र की कृषि जैव-विविधता को बचाने के साथ-साथ किसानों की आत्मनिर्भरता को भी मजबूत कर सकता है।

प्रशिक्षण और तकनीकी सहयोग की जरूरत भी समझी जा रही

सर्वेक्षण के दौरान किसानों की प्रशिक्षण, तकनीकी मार्गदर्शन, मिट्टी परीक्षण, बीज परीक्षण, बीज भंडारण, विपणन तथा सामुदायिक बीज बैंक से संबंधित आवश्यकताओं को भी समझा जा रहा है। इसके अलावा किसानों की बीज उत्पादन का रिकॉर्ड रखने, खेतों का समय-समय पर निरीक्षण कराने, बीज की गुणवत्ता बनाए रखने तथा पारंपरिक बीजों को लंबे समय तक सुरक्षित रखने की क्षमता और रुचि का भी आकलन किया जा रहा है।
पीएएचएडी ट्रस्ट और हिमआरआरए के सहयोग से आगे बढ़ रही पहल
प्रयास सोसाइटी के सचिव धीरज रमौल ने बताया कि इस महत्वपूर्ण कार्य में पीएएचएडी ट्रस्ट के निदेशक एवं हिमआरआरए के राज्य प्रभारी अनूप कुमार का मार्गदर्शन और सहयोग प्राप्त हो रहा है। वहीं पीएएचएडी ट्रस्ट की कृषि सलाहकार कर्मण्या जसरोतिया द्वारा कृषि संबंधी तकनीकी मार्गदर्शन प्रदान किया जा रहा है।
उन्होंने कहा कि पीएएचएडी ट्रस्ट और हिमआरआरए के सहयोग से पहाड़ी क्षेत्रों में वर्षा आधारित कृषि, प्राकृतिक खेती, स्थानीय कृषि संसाधनों के संरक्षण और किसानों की क्षमता बढ़ाने की दिशा में कार्य किया जा रहा है। इसी कड़ी में भरोग बनेड़ी में किया जा रहा सर्वेक्षण भविष्य की कृषि योजना तैयार करने में महत्वपूर्ण आधार साबित होगा।
इसके साथ ही कृषि प्रौद्योगिकी एवं विपणन एजेंसी (एटीएमए) के अंतर्गत राजीव गांधी प्राकृतिक खेती कौशल किसान योजना से जुड़े प्रयासों के माध्यम से भी प्राकृतिक एवं टिकाऊ कृषि को बढ़ावा देने की दिशा में कार्य किया जा रहा है।

151 किसानों तक पहुंचना महत्वपूर्ण उपलब्धि

धीरज रमौल ने कहा कि अब तक 151 किसानों तक पहुंच बनाना सर्वेक्षण की महत्वपूर्ण शुरुआत है। सर्वेक्षण से प्राप्त आंकड़ों के आधार पर भरोग बनेड़ी में उपलब्ध स्थानीय फसलों, पारंपरिक बीजों और कृषि पद्धतियों की वास्तविक स्थिति का आकलन किया जाएगा। इसके बाद किसानों की आवश्यकता के अनुसार प्रशिक्षण, तकनीकी सहयोग, बीज संरक्षण और अन्य गतिविधियों के लिए आगे की कार्ययोजना तैयार की जाएगी।
उन्होंने कहा कि प्रयास सोसाइटी का उद्देश्य किसानों की पारंपरिक बीज संपदा को पहचान, संरक्षण और उचित मंच प्रदान करना है। संस्था का प्रयास है कि गांव में “किसान का बीज, किसान के खेत और किसान के हाथ में बीज की पहचान” को मजबूत किया जाए।
उन्होंने कहा कि स्थानीय बीजों का संरक्षण केवल कृषि तक सीमित विषय नहीं है, बल्कि यह कृषि जैव-विविधता, खाद्य सुरक्षा, पारंपरिक ज्ञान और आने वाली पीढ़ियों के भविष्य से भी जुड़ा हुआ है। यदि स्थानीय स्तर पर उपलब्ध पारंपरिक बीजों का समय रहते संरक्षण, संवर्धन और दस्तावेजीकरण किया जाता है तो भरोग बनेड़ी को एक आदर्श बीज ग्राम के रूप में विकसित करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम उठाया जा सकता है।



दिल्ली में राष्ट्रीय परामर्श कार्यशाला में हिमाचल की प्रयास सोसाइटी ने लिया भाग

धीरज रमौल ने कहा - नागरिक समाज की भूमिका उपस्थिति से आगे बढ़कर सहभागिता और साझेदारी तक पहुंचे नई दिल्ली, 3 नवंबर। नागरिक समाज संगठनों के लिए...